हिन्दी साहित्य जगत विमल कुमार को भारत भूषण सम्मान प्राप्त एक कवि के रूप में ज्यादा जानता है। लेकिन पिछले दिनों वह एक नये रूप में नजर आए। दो कविता संग्रहों के बाद अपने उन्होंने गद्य लिखा है। विमल की नयी किताब का नाम है ‘चोर पुराण’ जिसका लोकार्पण पिछले दिनों हिन्दी के मशहूर आलोचक मैनेजर पांडे ने किया।
चोर पुराण एक दिलचस्प किताब है। इसे किसी एक श्रेणी में रख पाना कठिन है। इसमें लघुकथाएं हैं, व्यंग्य है और कविता भी। फिर भी इसे व्यंग्य संग्रह कह सकते हैं।
यह किताब एक चोर के नजरिये से अपने आस पास के समाज और विडंबनाओं को परखने की कोशिश है। विमल कुमार का चोर आपको बुरा तो लग सकता है, लेकिन आप उससे नफरत नहीं कर सकते। यह चोर अलग अलग नजरिये से दुनियां को देखता है। इस क्रम में वह समाज की कई नंगी सचाइयों को उघेड़ देता है।
विमल अपनी किताब में कई बार सीधे हमले में जुड़ जाते हैं। वह कई टुकड़ों में आज क राजनीतिज्ञों का नाम लेने लग जाते हैं। उस समय कई बार वो बड़ी विवादस्पद और कहीं कहीं गैरजरूरी टिप्पिणियां भी कर जाते हैं, जो नहीं की जाती तो कोई फर्क नहीं पड़ता।
पेश है पेंगुइन प्रकाशन से छपी विमल की किताब चोर पुराण के कुछ दिलचस्प अंश। उम्मीद है आपको ये अंश पसंद आएगें।
मंगलाचरण
चोर ने लिखी एक कहानी
इक कहानी में, सबकी कहानी
सबकी कहानी, सबकी कहानी
चोर ने लिखी एक कहानी
झूठ का है बस बोलबाला
ताक़त का है सब खेल सारा
पर सच की रहेगी हर पल निशानी
चोर ने लिखी एक कहानी
इक कहानी में, सबकी कहानी
लाखों डकारे पर चोर न कहलाए
राजा का वो ही मन बहलाए
जो छल करे वो इनाम पाए
जो तारीफ करे वो सम्मान पाए
चोर ने लिखी एक कहानी
इक कहानी में, सबकी कहानी
भांडा फूटे तो सब मिल जावें
अपने का खूब नैतिक कहलावें
कोई न देखे हमारी मजबूरी
हमने देखी सबकी कमजोरी
चोर ने लिखी एक कहानी
इक कहानी में, सबकी कहानी
जमा करें जो सोना चांदी
वो ही छीने हमारी आजादी
आएगी एक दिन इंकलाब की आंधी
बरसेगा तब खूब पानी
चोर ने लिखी एक कहानी
इक कहानी में, सबकी कहानी
चोर और चैनल
चोर को महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की एक छात्रा से प्रेम हो गया। वह शादीशुदा थी। चोर भी शादीशुदा था। पता नहीं कैसे टीवी चैनलवालों को यह पता चला गया। वे भागे भागे आए। फिर उन्होंने ख़बर दी:एक शादीशुदा चोर ने एक शादीशुदा छात्रा से किया प्रेम।
चोर ने चैनलवालों के एडिटरों को पत्र लिखकर गहरी आपत्ति जतायी- खबर में चोर शब्द का इस्तेमाल क्यों किया गया ? क्या एक चोर एक मनुष्य की तरह प्रेम नहीं कर सकता ?क्या एक चोर के रूप में परिचय दिया जाना जरूरी ह ?यह मामला चोर और उस छात्रा तथा चोर की पत्नी और छात्रा के पति के बीच का है। इसमें मीडिया कहां आ गया ?दरअसल प्रेम के माध्यम से दो स्त्रियां मुक्त होना चाहती थीं।
पाद टिप्पणी: ख़बर का शीर्षक यह भी हो सकता था पर समाज में जब प्रेम का संकट गहरा है तो भाषा का भी संकट गहरा जाता है।
चोर और प्रधानमंत्री
चोर पहले अपने देश के प्रधानमंत्री को बहुत ईमानदार मानता था। वह सोचता था कि वह भी चोरी का धंधा छोड़कर अपने प्रधानमंत्री की तरह ईमानदार बन जाएगा लेकिन उसके एक दोस्त ने कहा- ‘’तू ईमानदार नहीं बन सकता कभी भी, क्योंकि तेरा विश्व बैंक से कोई संबंध नहीं रहा है और तू जिन्दगी भर दिल्ली में रहते हुए असम से राज्यसभा का सदस्य भी नहीं बन सकता।
चोर और वामपंथी
चोर वामपंथियों के पास गया। उसने पूछा, ‘’ आप सरकार को कब तक समर्थन देते रहेंगे। कभी न कभी उनका दामन छोड़ना पड़ेगा। आप लोग जन आंदोलन क्यों नहीं करते? सालोंसाल से जहां हैं, वहां से आगे नहीं बढ़ पाए? वामपंथियों का गुस्सा आया। उन्होंने कहा, ‘’ एक तो तू चार है। ऊपर से नसीहत देता है। चल फुट जा। सीधे झंडेवाला से आ रहा है क्या?
चोर ने बुरा नहीं माना। वह जानता था वामपंथी हैं, आत्ममुग्ध होते हैं। पर हे प्रभु उन्हें माफ करना क्योंकि उनकी नीयत खराब नहीं है। जितनी बुद्धि उनके पास है, वे उससे वर्षों से लड़ रहे हैं।
चोर और अमेरिका
कुछ चोर ऐसे भी थे। वे चोरी नहीं करते थे। वे सांप्रदायिकता के खिलाफ लड़ते हैं। वे सभी प्रेमचंद की परंपरा से अपने को जोड़ लेते हैं और आज अमरीका के खिलाफ लड़ते हैं, पर उनके बच्चे फ़रार्टदार अंग्रेजी बोलते हैं और अमरीका में ही पढ़ते हैं।
वे अपने बच्चों से मिलने तीन महीने अमरीका में ही रहते हैं। वहीं किसी यूनिवर्सिटी में विजिटिन्ग प्रोफसर भी हो जाते हैं। डॉलर कमाकर लाते हैं।
वे अपने बच्चों की शादी फ़इव स्टार होटल में करते हैं, जहां सारे कॉमरेड जेएनयू में बिताए गए दिनों की चर्चा करते हैं।
पाद टिप्पणी: क्या आप कभी ऐसे किसी समाजवादी चोर के बेटे की शादी में गए हैं। मौका मिले तो जरूर जाइये। आपको पता चल जाएगा कि समाज में कितने तरह के चोर होते हैं।
बहुत खूब्!
गज्जब, भईया विमल कुमारजी, एकदम मारू टाइप व्यंग्य। एक मन तो कर रहा है कि खूब लिखिये व्यंग्य। पर डर रहा हूं कि मेरे जैसों की रोजी-रोटी का क्या होगा।
भाड़ में जाये रोजी-रोटी, मेरा विनम्र अनुरोध है कि विमलजी आप और लिखें व्यंग्य।
सादर
आलोक पुराणिक
मजेदार।
वाह भाई, बहुत खूब अंश प्रस्तुत किए हैं आपने! पढ़कर मजा आया।
बहुत अच्छा! दिलचोर, चित्तचोर, माखनचोर तो सुना था… अब इतने सारे क्षेत्रों में… पुराणों में इसे शामिल किया जाना चाहए।
बढ़िया विवरण. धन्यवाद/
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