‘मैं नहीं था लिखते समय’ कवि और चित्रकार गोबिन्द प्रसाद का दूसरा कविता संग्रह है जो हाल ही में ज्ञानपीठ प्रकाशन से छप कर आया है। गोबिन्द प्रसाद का पहला कविता संग्रह ‘कोई ऐसा शब्द दो’ 1996 में वाणी प्रकाशन से छपा था। दूसरे संग्रह को सामने आने में 11 साल का वक्त लगा।
‘मैं नहीं था लिखते समय’ में गोबिन्द की पिछले 10 से 11 साल के वक्फे में लिखी कविताओं का संग्रह है। इन कविताओं में इतने लंबे समय के बीच कवि की संवेदना में आए बदलाव का पता मिलता है।
बकौल दिनेश कुमार शुक्ल गोबिन्द प्रसाद की कविताएं पाठक के पास वैसे ही सहज चली आती हैं जैसे ससुराल से लौटती बेटी निस्संकोच मां की गोद में समा जाती है। सहजता इन कविताओं का ‘स्व’ भाव है।
गोबिन्द की कविताओं में उनके चित्रकार व्यक्तित्व को साफतौर पर महसूस किया जा सकता है। अपने चित्रों की तरह ही अपनी कविताओं में अक्सर मौन और अंतराल का सहारा लेते हैं। उनकी कविताएं वाचाल नहीं हैं। वे बहुत खामोशी से अपनी बात कह जाती है। पेश है ‘मैं नहीं था लिखते समय’ की कुछ चुनी हुई कविताएं।
मैं नहीं था लिखते समय
लिखते समय मैं नहीं था वह
जो कि मैं था लिखने से पहले
मुझ में दीख पड़ी कविता
लपट कोई नीली
तुमने उसे रख दिया
मांगे हुए उजाले के सामने
अनुभव जो झलकता था
मेरी पसलियों के साज़ में
दबा, लेकिन आह में छलकता-सा
उसे रख दिया तुमने
खुले आसमान के बीचो-बीच
शब्दों के बंजर इलाक़े में
और मैं अपना अनुभव छिनता हुआ
देखता रहा चुपचाप
फिर तुमने
मुझसे वह लय भी छीन ली
मैं जिसमें अहर्निश जागता था
वह लय भी
जिसमें मेरे होने के राज
धड़कते थे साज़ बन
तुमने उस अकेली और अनबोली
दर्द की लकीर को भी
रख दिया उठाकर
चैत की उदास हवा के सामने
जो मेरे सीने में कौंधती थी
बिजली की तरह
मर्म की आवाज बन
अब मेरे पास मेरा क्या है
था जो ठीकरा वह भी धुल गया
मिट्टी और हवाओं में
लपट बनकर
आकाश की ऋचाओं में
अब मुझे मेरे अनदेखे में सुनो
अब मुझे मेरे अनकहे में देखो
मैं यहां हूं, यहां हूं मैं !
लखौरी ईंटो से झांकते
मेरे बचपन की धूप में
ढ़ह गए बुर्ज की
भुरभुराती लखौरी ईंटो से झांकते
मेरे दादा हैं
परझाइयों में ढ़ूढते
ऊंघते हुए बैठ
पिता की शिकस्ता आवाज
तैर आती है मुझ तक
लौ के उदास सन्नाटे में
फ़क़ों से भरे दिन हैं
घर कुनबे के बुज़ुर्ग और सुबकते बच्चे
बहू-बेटियां, मां और दादी की सूनी आंखों में
लहकते हुए पुरखों के सपने हैं
तुम्हें कुछ पता है
ग़ुरबत में यह भी ग़रीबी से लड़ने की अदा है
समुद्र के सामने
मैं चुपचाप
खड़ा हूं समुद्र के सामने
तुम्हारे ध्यान की धूप में
खड़ा हूं मैं चुपचाप, अपने को अगोरता
समुद्र के सामने; सुनता हुआ
उठ रही
लौटती लहरों की वेदना धवल
विसंगति की धार पर
काट दिया पूरा जीवन
एक तरफ़ मरू-एक तरफ़ जल
बिखरा हुआ पूरा
समेटा हुआ अधूरा
कैसे-कैसे दुख हैं
जो सुख की चादर लिपटे हैं
चाहता हूं मैं पूरे समुद्र को इस चादर में बांध लूं
समुद्र जो निधि वन है
समुद्र जो सौन्दर्य है का सार है
समुदं जो सर्जना की कोख है
समुद्र जो सर्जना के रक्त में डूबा रहता है उम्र भर
चाहता हूं मैं
पूरे समुद्र को इस चादर में बांध लूं
महाराग
तुम्हारी काया:
चांदनी
रात के दूसरे पहर में
उमड़ता हुआ समुद्र
कांच के नाज़ुक आबगीने से मानो
छलक रहा हो
समय का महाराग
प्यास की तरह लिपटा हुआ हूं मैं
तुम्हारी काया के कांच से
अग्निरूपा
सहस्ररूपा तुम
भोर से पहले न जाने कितनी बार
भोर रचोगी
हर क्षण अब एक नए लोक में
जन्मांतर हूं मैं….
नयी बस्तियों की तरफ
नए-नए दोस्त होंगे
नए संग-सहारे होंगे
जहां पहुंचूंगा मुरादों का सफ़र तय करके
कुछ फ़िदा मुझ पर
तो कुछ लोग ख़फ़ा भी होंगे
मां की नीद में
बच्चों ने करवटें ली होंगी
तो किसी ने सहसा गलियारे में किलक भरी होगी
सीढ़ियों से ज़रा हटकर
किसी कोने में आंख मलते हुए
ख़ुद को सहेजते
अंगीठी किसी ने दहकायी
उठ रहा होगा धुआं
कोई ऐसी भी होगी
जिसकी अलसायी आंखों में
झांक रहा होगा कुआं
सुबह से पहले परिन्दे भी
अपनी उड़ान में गुम होंगे
अजनबियों के बीच
अपना-सा
दिन जो बीत गया
खुली आंखों में सपना-सा…
यादों की किताब बन्द करता हूं
बहरहाल मैं भी चलता हूं घर से
बाहर आने को भीतर से
रातों के ख़ाब झटककर
नयी चादर बुनने को, रंग नए भरने को
नयी बस्तियों की तरफ़ चलता हूं
सूरज को भी नए तार सो बुनना होगा
धरती को भी राग नए सुनाने होंगे
बहुत सुन्दर कविताएँ हैं ।
घुघूती बासूती
पता नहीं पर इन रचनाओं ने मुझे कोई खास प्रभावित नहीं किया।
सामने सब के स्वीकार करता हूँ
हिन्दी से कितना प्यार करता हूँ
कलम है मेरी टूटी फूटी
थोड़ी सुखी थोड़ी रुखी
हर हिन्दी लिखने वाले का
प्रकट आभार करता हूँ
आप लिखते रहिए
मैं इन्तज़ार करता हूँ ।
NishikantWorld
kabhi kabhi blog padte padte jab aisi kavitaye padne ko mil jati hai to bas man kahi thitak kar rah jata hai,kai der tak vahi bandha hua.
ek fuhar si chod gayi in genhu aor share market ki bato ke beech.