उच्चतम न्यायालय ने गुरूवार को समाजसेवी वंदना शिवा की गेहूं के आयात के सरकार के फैसले पर आपत्तियों से संबधित याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि वह नीतिगत मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहती।
वंदना शिवा ने एक बहुत ही सीधी सी बात पर आपत्ति की थी कि सरकार लगभग 1680 रूपए प्रति क्विंटल के भाव से गेहूं का आयात क्यों करना चाहती है जबकि उसे देश में ही आयतित गेहूं की गुणवत्ता से कहीं बेहतर गेहूं महज 1000 रूपए प्रति क्विंटल के भाव से मिल सकता है।
यह सवाल सिर्फ वंदना शिवा ही हर शख्स के मन में उठना चाहिये कि सरकार अपने किसानों को तो प्रति क्विंटल 750 रूपए समर्थन मूल्य एवं 100 रूपए बोनस मिलाकर 850 रूपए प्रति क्विंटल दे रही है जबकि विदेशों से वह लगभग दोगुनी कीमत पर आयात करने को उतारू है।
सरकार विदेशों से चाहे जितना महंगा गेहूं मंगाए लेकिन वह सब्सिडी देकर सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से सस्ता गेहूं बेचती है। लेकिन वही सब्सिडी वह किसानों को क्यों नहीं देती। अगर सरकार समर्थन मूल्य 200 रूपए बढ़ा दे और आम आदमी को बेचते समय इतने ही रूपए की सब्सिडी दे दे तो भी उसे गेहूं विदेशों से कहीं अधिक सस्ता पड़ेगा।
हालांकि ऐसा कुछ होने वाला नहीं है क्योंकि कृषि मंत्री शरद पवार ने कुछ दिनों पहले बड़ी बेशर्मी से बयान दिया था कि सरकार विदेशों से गेहूं आयात करेगी लेकिन किसानों के लिये तय न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोत्तरी नहीं करेगी।
ऐसा भी नहीं है कि देश में इस वर्ष गेहूं का उत्पादन कम हुआ हो जिसकी वजह से सरकार को गेहूं आयात करने की नौबत आन पड़ी हो। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार पिछले साल देश में 6.94 करोड़ टन गेहूं का उत्पादन हुआ था और इस वर्ष 7.37 करोड़ टन गेहूं की उपज होने की संभावना है।
लाख कोशिशों के बाद भी सरकार इस बार गेहूं की सरकारी खरीद का लक्ष्य पूरा नहीं कर सकी। सरकार ने बफर स्टाक के लिये 1.5 करोड टन गेहूं की खरीद का लक्ष्य तय किया था लेकिन शुक्रवार तक 97 लाख टन गेहूं की ही खरीद हो सकी थी। इसका मतलब है कि इस बार भी सरकार ने करीब 50 लाख टन गेहूं आयात का मन बना लिया है। राज्य व्यापार निगम पहले ही 10 लाख टन गेहूं के आयात का टेंडर जारी कर चुका है।
पिछले साल भारत ने खासकर आस्ट्रेलिया से 55 लाख टन गेहूं का आयात किया था। भारत द्वारा आयात करने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं के दामों में काफी उछाल आ गया था। इस उछाल की वजह से अफगानिस्तान, अल्जीरिया, ब्राजील, ईरान और ट्यूनीशिया जैसे गेहूं के पारंपरिक आयातक देशों की शामत आ गयी थी। इस साल भी भारत द्वारा गेहूं आयात करने की खबरों से अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं की कीमतों में उबाल आ गया है।
ऐसे में यह वाजिब सवाल उठता है कि सरकार गेहूं का आयात करने पर क्यों उतारू है। क्या राजनेताओं को विदेशी कंपनियों से मिलने वाली दलाली भी एक बड़ी वजह है। सरकार अगर चाह ले तो निजी कंपनियां उसका मुकाबला नहीं कर सकतीं। क्यों नहीं सरकार थोड़ा और समर्थन मूल्य बढ़ाकर निजी कंपनियों के मुकाबले किसानों से अधिक गेहूं खरीद लेती।