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 जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनावों में भाकपा माले के छात्र संगठन आइसा ने पहली बार चारों सीटों पर कब्‍जा जमाकर वामपंथ के कि‍ले को सुरक्षि‍त रखने में कामयाबी पायी है। दूसरी ओर माकपा एवं भाकपा के छात्र संगठन एसएफआई एआईएसएफ 1989 के बाद पहली बार सेंट्रल पैनल में कोई भी सीट जीत पाने में नाकामयाब रही।

आइसा के संदीप सिंह अध्यक्ष (1218), शेफ़ालिका शेखर उपाध्यक्ष (1077), पल्लवी डेका (1029) महासचिव और मोबिन आलम (933) संयुक्त सचिव के पद पर चुने गए हैं।

चारों पदों के लिए हुए चुनाव में आइसा उम्मीदवारों ने एसएफ़आई-एआईएसएफ़ और आरक्षण विरोधी संगठन यूथ फ़ॉर इक्वैलिटी के प्रत्याशियों को हराया।

आरक्षण विरोधी संगठन यूथ फॉर इक्वैलिटी अध्‍यक्ष एवं महासचि‍व पद पर दूसरे और उपाध्‍यक्ष एवं संयुक्‍त सचि‍व पद पर तीसरे स्‍थान पर रहा। लेकिन उसने भाजपा के अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) और कांग्रेस के छात्र संगठन (एनएसयूआई) के वोटों में ख़ासी सेंध लगाई।

अध्यक्ष पद के चुनाव में यूथ फ़ॉर इक्वैलिटी की बबिता शर्मा 924 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रहीं। इसी संगठन की स्वास्ति राव को 927 वोट मि‍ले और उन्‍हें महासचिव पद पर दूसरे स्थान से संतोष करना पड़ा।

एसएफ़आई और एआईएसएफ़ गठबंधन के रोशन किशोर और सेजुरी दासगुप्ता उपाध्यक्ष और संयुक्त सचिव पद के चुनाव में दूसरे पायदान पर रह गए।

 इस बार के चुनावों में अमरीका के साथ परमाणु क़रार, एसईज़ेड नीति ख़ासकर सिंगुर और नंदीग्राम के मामले और आरक्षण प्रमुखता से उठे। कैंपस में मज़दूरों के अधिकार को लेकर पिछले दिनों हुए आंदोलन और उसमें अलग-अलग छात्र संगठनों की भूमिका भी चुनावी मुद्दा रहा।

इस बार जेएनयू में प्रेसिडेंशि‍यल डि‍बेट के दौरान अखि‍ल भारतीय वि‍द्यार्थी परि‍षद.एबीवीपी और बहुजन समाज पार्टी के छात्र संगठन बीएसएफ के बीच झड़प भी हुई थी। दरअसल‍ एबीवीपी के अध्‍यक्ष पद के उम्‍मीदवार अमि‍त सिंह के राम पर पूछे गए एक सवाल पर बीएसएफ के रघुनाथ प्रसाद साकेत ने राम के चरि‍त्र पर कथि‍त आपत्‍ति‍जनक टि‍प्‍पणी कर दी जि‍स पर हंगामा खड़ा हो गया।

 अध्यक्ष पद पर जीते संदीप सिंह का कहना है, “ उनकी यह जीत भारत अमरीका परमाणु करार और वि‍शेष आर्थिक क्षेत्र.सेज के खि‍लाफ और सामाजि‍क न्‍याय के पक्ष में जेएनयू के छात्रों का जनादेश है। चारों पदों पर आइसा की जीत तमाम पार्टियों की जनविरोधी नीतियों के ख़िलाफ़ वोटिंग से संभव हुई है।

दूसरी ओर एसएफआई के दि‍ल्‍ली प्रदेश उपाध्‍यक्ष रोहि‍त का कहना है कि‍ उनका संगठन इस जनादेश को स्‍वीकार करता है। एसएफआई अपने भीतर झांक कर उन कारणों का पता लगाने की कोशि‍श करेगी जि‍नकी वजहों से उसे हार का मुंह देखना पड़ा।   

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वैश्‍ि‍वक शेयर बाजारों में भारी उथल पुथल को देखते हुए सोने जैसे अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित माने जाने वाले निवेश में निवेशकों का भरोसा एक बार फिर बढ़ा है।
   जहां एक ओर वैश्‍ि‍वक रूप से शेयर बाजारों की हालत पतली हुई है वहीं सोना नित नयी ऊंचाइयां छू रहा है। गत शुक्रवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने के भाव 770 डालर प्रति ट्राय औंस को छू गए जो जनवरी 1980 के बाद का सर्वोच्च स्तर है।
  दूसरी ओर तीन महीने पहले स्थानीय सर्राफा बाजार में सोना जहां आठ हजार रूपए प्रति 10 ग्राम हुआ करता था वहीं यह गत शुक्रवार को एक समय 10 हजार रूपए प्रति 10 ग्राम के स्तर को छू गया जो इस साल का सर्वोच्च स्तर है। इस प्रकार पिछले तीन महीने में सोने के दाम लगभग 25 प्रतिशत तक चढ़ गए हैं।
  वल्र्ड गोल्ड काउंसिल के उपनिदेशक केयुर शाह ने एक बातचीत में कहा कि सोने को पारंपरिक रूप से एक सुरक्षित निवेश माना जाता रहा है। खासकर संकट के दिनों में इसकी महत्ता बढ़ जाती है।
  श्री शाह का कहना है कि वैिश्वक शेयर बाजारों में भारी अनिश्‍ि‍चतता के बरक्स अन्य विदेशी मुद्राओं के मुकाबले डालर के लगातार गिरने तथा कच्चे तेल के दाम 90 डालर प्रति बैरल के पार चले जाने से सोने की कीमतों में पिछले कुछ महीनों से जिसे तरह से आग लगी है उससे निवेशकों का एक बार फिर से इसकी ओर आकर्षित होना लाजिमी है।
  डद्योग एवं वाणिज्य संगठनण्ऐसोचैम की हाल में जारी एक अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल में देश में सोने में निवेश पर रिटर्न यानी प्रतिफल करीब 34 फीसदी बढ़ा है। पिछले 30 दिनों में ही सोने में निवेश पर रिटर्न 14 प्रतिशत बढ़ा है।
   विश्लेषकों का कहना है कि वैश्‍ि‍वक रूप से वित्तीय बाजारों की हालत पतली होने के कारण निवेशक शेयर बाजारों से पैसा निकाल कर सोने में लगा रहे हैं। डालर के कमजोर होने से अन्य विदेशी मुद्राओं में सोने का निवेश सस्ता पड़ता है। यही कारण है कि सोने की लिवाली लगातार बढ रही है और इसके दाम आसमान छू रहे हैं।
   श्री शाह का कहना है कि सोने में आयी वैश्‍ि‍वक तेजी प्राकृतिक है क्योंकि इसकी मांग दिनों दिन बढ़ रही है जबकि आपूर्ति स्थिर है। विश्व में इस समय करीब 400 खानों से सोना निकाला जा रहा है। जहां इसकी  वैश्‍ि‍वक मांग करीब 5000 टन है वहीं पिछले पांच सालों से इसका उत्पादन औसतन 2550 टन के आसपास टिका है। सोने की मांग और आपूर्ति में इतने बड़े अंतराल से इसकी कीमतें आगे और ऊपर जाने की उम्मीद है।
  दूसरी ओर एसोचैम के आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2005..06 के दौरान भारत में सोने का उत्पादन जहां लगभग 3.53 टन था वहीं कारोबारी साल 2006.07 के दौरान यह घटकर 3.05 टन रह गया।
  यही कारण है कि भारत अपनी सोने संबंधी मांग को बड़े पैमाने पर आयात से पूरा करता है। वल्र्ड गोल्ड काउंसिल के आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2006.07 में जहां भारत ने करीब 750 टन सोने का आयात किया वहीं चालू वित्त वर्ष के दौरान यह बढ़कर 1000 टन हो जाने की उम्मीद है।
  धातु एवं जिंसों के वायदा कारोबार एक्सचेंजण्एनसीडीएक्स के क्षेत्रीय प्रमुख आर रघुनाथन का कहना है कि एक्सचेंजों के माध्यम से सोने चांदी का आनलाइन कारोबार शुरू हो जाने से निवशकों के लिये इसमें निवेश और अधिक सहज हो गया है।
   श्री रघुनाथन का कहना है कि डी मैट खाते से सोने चांदी का वायदा कारोबार शुरू होने से इसे भौतिक रूप से खरीद कर अपने पास रखने की जरूरत नहीं है। इससे जोखिम खत्म हो गया है।
   विदेशों में सोने में निवेश के लिये कई सालों के लिये अलग फंड बने हैं लेकिन भारत में यह प्रक्रिया अभी नयी नयी है। श्री रघुनाथन ने बताया कि पिछले दिनों यूटीआई ने सोने में निवेश के लिये एक फंड शुरू किया है। हालांकि यह बहुत सफल नहीं हो सका है क्योंकि निवेशकों में इसके प्रति अभी जागरूकता का अभाव है। उम्मीद है कि सोने में बढ़ते रिटर्न को देखते हुए आने वाले दिनों में कई अन्य कंपनियां सोने में निवेश के लिये कोष शुरू करेंगी। 
   सोने में निवेशकों की बढ़ती रूचि का एक कारण डालर के मुकाबले रूपए की मजबूती भी है। रूपए की मजबूती के कारण सोने का आयात सस्ता पड़ रहा है जिससे इसकी मांग बढ़ रही है। वैसे कारोबारियों का कहना है कि अगर रूपए के मुकाबले डालर अगर पिछले साल के स्तर पर रहता तो सर्राफा बाजार में सोने के दाम इस समय करीब 12000 रूपए प्रति 10 ग्राम होते।
  एसोचैम के आकलन के अनुसार भारत में आयात होने वाले सोने में से 70 फीसदी का इस्तेमाल आभूषणों और बाकी 30 प्रतिशत का प्रयोग निवेश के लिये बिस्कुटों और सिक्कों में होता है। सोने में निवेशकों की बढ़ती रूचि को ध्यान में रखते हुए इंडियन बैंक सहित कुछ बैंकों ने हालमार्क युक्त सोने के बिस्कुट और सिक्के बेचने शुरू कर दिये हैं।
   विश्लेषकों का कहना है कि निवेशकों के लिये आभूषणों के बजाए सोने के बिस्कुटों और सिक्कों में निवेश कहीं अधिक सहज होता है क्योंकि गहनों को दोबारा बेचने पर इसके दामों में 25 प्रतिशत तक की कटौती हो जाती है। वहीं बिस्कुटों और सिक्के लगभग बाजार भाव पर ही बिक जाते हैं।
   त्योहारी मौसम और शादी ब्याह का मौसम नजदीक आने के कारण देश में सोने की मांग प्राकृतिक रूप से बढ़ जाती है। ऐसे में सोने में निवेशकों की रूचि और बढने की उम्मीद है।

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स्‍टाक मार्केट में आज भारी अफरातफरी रही। एक मिनट के भीतर ही भारी गिरावट के कारण शेयर बाजारों में कारोबार को एक घंटे के लिये रोकना पड़ा।
   पार्टीसिपेटरी नोट.एन के जरिये विदेशी संस्थागत निवेशकों के शेयर बाजार में निवेश पर लगाम संबंधी भारतीय प्रतिभूति विनिमय बोर्डण्सेबी की कल की सिफारिश से बाजारों में इतनी दहशत रही कि सेंसक्स एक मिनट के भीतर ही 1507.71 अंक लुढ़कर 17544.90अंक रह गया। निफ़टी लगभग 10 फीसदी यानी 524.15 अंक गिरकर 5143.90 अंक रह गया।
  निचला सर्किट लगने के कारण बाजार में कारोबार को एक घंटे के लिये रोक दिया गया।

बाजारों की अफरातफरी के बीच वि‍त्‍त मंत्री को बयान देना पड़ा कि‍ सरकार का पीएन पर रोक लगाने का इरादा नहीं है। बस वह इसे  नि‍यंत्रि‍त करना चाहते है। यह आम नि‍वेशकों के हि‍त में है।

बाजार दोबारा खुलने के बाद कुछ सुधार की स्‍ि‍थति‍ में हैं। कई वि‍देशी संस्‍थागत नि‍वेशक गि‍रावट में खरीद कर रहे है। वि‍त्‍त मंत्री को उम्‍मीद है कि‍ शाम तक स्‍ि‍थति‍ काबू में आ जाएगी।

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  गेहूं.चावल सहित कई अन्य कृषि जिंसों के न्यूनतम समर्थन मूल्य.एमएसपी में बढ़ोत्तरी करके सरकार ने किसानों को तो राहत देने की तो कोशि‍श की है लेकिन इसके साथ ही आने वाले दिनों में रसोईं का बजट बेकाबू हो जाने का इंतजाम भी हो गया है।

    सरकार ने आगामी रबी मौसम के लिये गेहूं का समर्थन मूल्य 750 रूपए से 250 रूपए बढ़ाकर 1000 रूपए कर दिया है। पंजाब और हरियाणा जैसे प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों में 4.5 फीसदी मंडी कर. प्रतिशत आढ़तिया कर. फीसदी वैट. दो प्रतिशत ग्रामीण विकास कर निजी और सरकारी सभी कंपनियों को देना होता है। पंजाब में एक प्रतिशत बुनियादी ढांचा विकास कर भी देना होता है।

  इस प्रकार सरकार को ही अगले मौसम में गेहूं के लिये प्रति क्‍ि‍वंटल कम से कम 1100 रूपए चुकाने होंगे। कहा जा रहा है कि सरकार गेहूं की एमएसपी पर 50 रूपए का बोनस भी देगी। अगर ऐसा होता है तो परिवहन शुल्क मिलाकर सरकार को गेहूं की खरीद लागत 1200 रूपए से कम नहीं पड़ेगी। निजी कंपनियां तो सरकार से अधिक ही भाव देंगी।
  

ऐसे में थोक मंडियों में जो गेहूं इन दिनों 1050.1060 रूपए प्रति क्‍ि‍वंटल बिक रहा है वह अगले मौसम में 1300.1400 से कम नहीं मिलेगा। इसी अनुपात में आटे और मैदे की कीमतों में भी बढ़ोत्तरी होगी। ऐसे में महंगी रोटी खाने की आदत डाल लेने में ही भलाई है।

   सरकार ने धान के समर्थन मूल्य पर 50 रूपए का बोनस घोषित किया है। इसके साथ ही सरकार ने जौ का समर्थन मूल्य 85 रूपए, चना और मसूर का 155 रूपए, सरसो एवं सूर्यमुखी बीज के एमएसपी में में 85 रूपए की बढोत्तरी की है।

  एनसीडीएक्स इंस्टीट्यूट आफ कमोडिटी मार्केट्स एंड रिसर्च के निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी संजय कौल भी यह मानते हैं कि कृषि जिंसों का एमएसपी बढ़ाने से कीमतें तो बढ़नी ही हैं।

   थोक मंडियों के कई कारोबारियों का कहना है कि आमतौर पर सरकार पहले मार्च अप्रैल में गेहूं की खरीद शुरू होने से पहले एमएसपी का एलान करती थी। लेकिन इस बार काफी पहले ही एमएसपी की घोषणा से स्टाकिस्टों को सक्रिय होने का मौका मिल गया है।

   कारोबारियों का कहना है कि सरकार ने जिस दिन एमएसपी बढ़ाने की घोषणा की उसके ठीक दूसरे दिन थोक मंडियों में गेहूं.आटे और मैदे के भाव 50 से 60 रूपए प्रति क्‍ि‍वंटल ऊंचे हो गए।

     हालांकि श्री कौल सहित कई विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही एमएसपी बढ़ाने के कदम को चुनाव की आहट में उठाया गया कदम समझा जा रहा हो लेकिन बुवाई शुरू होने से पहले ही एमएसपी की घोषणा से किसान यह तय कर सकेगा कि उसे उसकी उपज की कम से कम कितनी कीमत मिलनी है।

  कृषि मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि सरकार ने बुवाई सत्र से पहले ही एमएसपी का एलान नीतिगत फैसले के तहत किया है। सरकार अब बुवाई से पहले ही एमएसपी की घोषणा कर दिया करेगी।

   इस मौसम में देश में पर्याप्त गेहूं नहीं मिलने पर विदेशों से दोगुने दाम पर गेहूं मंगाने के कारण चौतरफा आलोचना से सरकार इतना अधिक दबाव में आ गयी थी कि उसे एमएसपी बढ़ाने का कदम उठाना पड़ा।

  हालांकि कई विशेषज्ञों का मानना है कि केवल एमएसपी बढ़ाने से किसानों की समस्या का समाधान नहीं हो सकता। सरकार को पूरी गेहूं खरीद प्रक्रिया में ही सुधार करने की जरूरत है जिससे उसे पर्याप्त देश में ही पर्याप्त गेहूं और अन्य अनाज मिल सके।

   कमोडिटीज कंट्रोल डौट काम के प्रमुख कमल शर्मा का मानना है कि खेती किसानों के लिये लाभकारी हो इसके लिये जरूरी है कि किसानों को अपने उत्पादों को किसी भी बेचने की पूरी छूट होनी चाहिये। साथ उन्हें उनकी उपज का पूरा पैसा तत्काल मिलने की व्यवस्था की जानी चाहिये।

   श्री शर्मा का कहना है कि अगर गन्ना किसानों की बात की जाए तो गन्ना पेराई का नया सत्र शुरू हो गया है लेकिन उन्हें पिछले सीजन का ही पैसा नहीं मिल सका है। इसके साथ ही फसल बीमा योजना को सही तरीके से लागू करना चाहिये ताकि किसानों का जोखिम कुछ हद तक कम हो सके।

   दूसरी ओर श्री कौल का सुझाव है कि सरकार को पहले तो जितना गेहूं मिल सके खरीदना चाहिये। उसके बाद अगर गेहूं कम पड़ता है तो आयात करने के बजाए घरेलू बाजार में ही निविदा निकालनी चाहिये।

    सरकार के गेहूं और अन्य कृषि उत्पादों का एमएसपी बढ़ाने से यह तो तय हो गया है कि गरीबों की रोटी और महंगी ही होगी और इसमें कमी आने की फिलहाल तो कोई सूरत नजर नहीं आती। लेकिन सरकार को कृषि उत्पाद खरीद व्यवस्था को दुरूस्त करते हुए दूर दराज के इलाकों तक अपनी पहुंच बढ़ानी चाहिये ताकि गेहूं जैसे अनाजों के आयात की नौबत ना आए।

  

 

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भारतीय कंपनियों की विदेशों में अपना विस्तार करने की भूख लगातार बढ़ती ही जा रही है और एशि‍या तथा अमरीका के बाद अब यूरोप इनके निशाने पर है।

  भारतीय कंपनियों ने इस वर्ष जनवरी से अगस्त के बीच विदेशों में कंपनियां के अधिग्रहण एवं विलय के कुल 164 सौदे किये जिसके लिये उन्होंने लगभग 30.8 अरब डालर निवेश किया। इनमें से 16.3 अरब डालर निवेश से 55 सौदे केवल यूरोपीय कंपनियों से हुए।

   विश्व की अग्रणी लेखा एवं सलाहकार फर्म ग्रांट थोर्नटन द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक भारतीय कंपनियों ने इस साल लगभग 45 प्रतिशत निवेश केवल ब्रिटेन में किया। इसमें 6.7 अरब पौड़ में टाटा स्टील के अपने से कई गुना बड़ी एंग्लो डच कंपनी कोरस का अधिग्रहण भी शामिल है।

  भारतीय कंपनियों ने ब्रिटेन में 13.6 अरब डालर के निवेश से कुल 15 सौदे किये। यूरोप में भारतीय कंपनियों का दूसरा पसंदीदा देश जर्मनी रहा जहां इन्होंने दो अरब डालर खर्च करके पांच सौदे किये।

   विशेषज्ञों का मानना है कि यूरोपीय कंपनियों में भारतीय कंपनियों की बढ़ती रूचि का एक कारण यह है कि उन देशों की नीतियां इनके बेहद मुफीद पड़ती हैं। खासकर ब्रिटेन का प्रशासनिक एवं कानूनी ढांचा भारत जैसा ही है। दूसरे अंग्रेजी के कारण उन्हें भाषा संबंधी दिक्कतों का सामना भी नहीं करना पड़ता
   भारत.पाल और भूटान के लिये यूरोपीय आयोग के प्रतिनिधिमंडल के पूर्व प्रमुख फ्रांसिस्को द कामारा गोम्स ने भी पिछले दिनों अपना कार्यकाल खत्म होने के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में स्वीकार किया कि यूरोप में इस तरह का माहौल बनाया गया है कि भारतीय कंपनियां वहां सहज महसूस कर सकें।
  श्री गोम्स ने कहा कि टाटा कोरस और आर्सेलर मित्तल सौदे से यह बात साबित भी होती है। उनका मानना है कि भारत और यूरोप के बेहतर होते द्विपक्षीय आर्थिक संबंधों का ही नतीजा है कि दोनों एक दूसरे के यहां निवेश कर रहे हैं।
   यूरोप के बाद भारतीय कंपनियों ने लगभग 12 अरब डालर निवेश से 68 सौदे उत्तर अमरीका में किये। एशि‍याई देशों में इन कंपनियों ने लगभग 2.2 अरब डालर खर्च करके 31 सौदे किये। विश्व के अन्य हिस्सों में इस अवधि में 20 करोड़ डालर निवेश से 10 सौदे हुए।

   टाटा स्टील ने इस वर्ष अप्रैल में ब्राजील की सीएसएन को पछाड़कर लगभग 12.2 अरब डालर ब्रिटेन की कोरस का अधिग्रहण कर लिया। यह इस वर्ष किसी भारतीय कंपनी का सबसे बड़ा सौदा था। यह भारतीयों कंपनियों द्वारा इस वर्ष विदेश में अधिग्रहण में खर्च किये गए धन का करीब 40 फीसदी है।
   आदित्य बिरला समूह की एल्युमिनियम कंपनी हिंडाल्को का लगभग छह अरब डालर में इसी क्षेत्र की अमरीकी कंपनी नोवेलिस का अधिग्रहण दूसरा सबसे बड़ा सौदा रहा। ऊर्जा क्षेत्र की कंपनी सुजलान एनर्जी ने जर्मनी की आरई एनर्जी की 33.9 फीसदी हिस्सेदारी लेने में 1.7 अरब डालर निवेश किया जो भारतीय कंपनियों का तीसरा सबसे बड़ा सौदा रहा।
   विजय माल्या की यूबी समूह ने इसी साल ब्रिटेन के स्काच ब्रैंड वाइट एंड मैके का लगभग एक अरब डालर में अधिहग्रण किया जो यूरोप में किसी भारतीय कंपनी का तीसरा सबसे बड़ा सौदा है।

   पिछले साल भारतीय कंपनियों ने विदेशों में 8.6 अरब डालर के निवेश से अधिग्रहण एवं विलय के कुल 190 सौदे किये। इनमें से 3.6 अरब डालर के निवेश से 70 सौदे यूरोप में और 2.1 अरब डालर खर्च करके 71 सौदे उत्तर अमरीका में हुए।

   विशेषज्ञों का मानना है कि देश की अर्थव्यवस्था के बेहतरीन प्रदर्शन से भारतीय कंपनियों का न केवल आत्मविश्वास बढ़ा है बल्कि उनकी वित्तीय स्थिति भी मजबूत हुई है। प्रतिस्पर्धी ब्याज दरों पर भारतीय तथा अंतरराष्ट्रीय बैंकों एवं वित्तीय संस्थाओं से रिण की सहज उपलब्धता से भी इनका काम आसान हुआ।
   विदेशों में सौदों के लिये स्टैंडर्ड चाटर्ड. आईसीआईसीआई बैंक.भारतीय स्टेट बैंक. आरबीएस. एचबीओएस. सिटी ग्रुप. एलाइड आईरिश बैंक.एबीएन एमरो और बीएनपी पारीबा जैसे बैंकों ने भारतीय बैंको को वित्तीय सहायता मुहैया करायी।
   भारतीय कंपनियों में बैंको का विश्वास कितना बढ़ा है इसका अंदाजा भारतीय स्टेट बैंक के अध्यक्ष ओ.पी.भट्ट के हाल के इस खुलासे से लग सकता है कि उनके बैंक ने कोरस के अधिग्रहण के लिये टाटा को एक अरब डालर का रिण महज पांच मिनट में ही दे दिया था।
  यूरोप में भारतीय कंपनियों के अधिग्रहण और विलय का सिलसिला अभी थमने नहीं जा रहा है। टेटले चाय और कोरस के अधिग्रहण के बाद टाटा समूह की नजर ब्रिटेन के फोर्ड के मशहूर कार ब्रैंड लैंड रोवर और जगुआर के बड़े सौदे पर है। इसी तरह कई अन्य कंपनियां भी यूरोप में अधिग्रहण की कोिशश में हैं।

           

विदेशों से लगभग दोगुने दाम पर गेहूं आयात करने के फैसले पर सरकार चौतरफा आलोचना से घिर गयी है। लेकिन अगर वह थोड़ी सी समझदारी दिखाती तो उसे देश में ही आयतित दाम से कहीं अधिक सस्ता गेहूं मिल जाता।

 

   सरकार ने सार्वजनिक वितरण प्रणालीण्पीडीएस और सुरक्षित स्टाक के लिये इस बार 1.5 करोड़ टन सरकारी खरीद का लक्ष्य रखा था लेकिन वह लगभग 1.1 करोड़ टन गेहूं ही खरीद सकी। इस प्रकार करीब 40 लाख टन गेहूं सरकार को कम मिल पाया।

 

   इस कमी को पूरा करने के लिये सरकार ने अब तक गेहूं आयात के तीन टेंडर निकाले हैं। पहला टेंडर मई में निकाला गया जिसके लिये कंपनियों ने औसत 263 डालर प्रति टन की बोली दी जिसे सरकार ने महंगा बताकर खारिज कर दिया। लेकिन दो महीने बाद ही सरकार ने औसतन 325 डालर प्रति टन के भाव पर 5.11 लाख टन गेहूं आयात का सौदा कर लिया। पिछले दिनों सरकार ने औसतन 390 डालर के भाव पर 7.9 लाख टन गेहूं आयात का एक और सौदा किया है।

 

    सरकार को गुजरात के मुंदरा बंदरगाह पर विदेशों से आयतित गेहूं करीब 1600 रूपए प्रति क्‍विं‍टल पड़ेगा और विश्लेषकों के अनुसार दिल्ली तक आते आते इसके भाव 1700 रूपए प्रति क्‍विं‍टल तक पहुंच जाएंगे। दूसरी ओर सरकार ने अपने किसानों को 750 रूपए समर्थन मूल्य और 100 रूपए का बोनस यानी कुल 850 रूपए प्रति क्‍विं‍टल का भाव दिया था।

 

   ऐसा बिल्कुल नहीं है कि देश में इस बार गेहूं का उत्पादन कम हुआ है जिसकी वजह से सरकार के पास विदेशों से गेहूं मंगाने के अलावा कोई और चारा नहीं बचा हो। सरकारी अनुमान के अनुसार इस साल देश में करीब 7.5 करोड़ टन गेहूं का उत्पादन हुआ है जो पिछले साल के लगभग 6.95 करोड़ टन से करीब 60 लाख टन अधिक है। इस बार साल 2000 के बाद सबसे अच्छी फसल हुई है। उस साल करीब 7.64 करोड़ टन गेहूं का उत्पादन हुआ था।

 

   वामपंथी दलों, वि‍पक्ष और कृषि वैज्ञानिकों ने भी दोगुने दाम पर गेहूं आयात करने का कड़ा विरोध किया है। जनता दल यूनाइटेड के शरद यादव ने तो मुंदरा बंदरगाह से गेहूं न उतरने तक की धमकी दी है। वहीं भारतीय जनता पार्टी ने इसे दिन दहाड़े लूट और घोटाला करार दिया है।

 

    भारत में हरित क्रांति के जनक माने जाने वाले प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक एम.एस स्वामीनाथन ने खाद्य सुरक्षा के नजरिये से गेहूं आयात का समर्थन जरूर किया है लेकिन उन्होंने अत्यंत महंगाई के समय लेकर सवाल उठाये हैं।

 

    यही नहीं डा. स्वामीनाथन ने गेहूं खरीद के पूरे सरकारी प्रबंधन पर सवालिया निशान लगाए हैं। पिछले दिनों उन्होंने एक निजी टीवी चैनल से बातचीत में कहा कि चार पांच सालों के दौरान गेहूं का सुरक्षित भंडार लगातार गिरता गया है।

 

   उनका कहना है कि घरेलू बाजार में निजी कंपनियों को सीधी खरीद की इजाजत देने के सरकार के फैसले की समीक्षा होनी चाहिये। कारगिल जैसी बड़ी निजी कंपनियों को किसानों से सीधे गेहूं खरीदने की इजाजत मिलने के बाद इस तरह के परिणाम आश्चर्यजनक नहीं हैं।

 

   डा. स्वामीनाथन की बातों पर गौर किया जाए तो पूरे खाद्य प्रबंधन में एक झोल नजर आता है। कृषि मंत्री शरद पवार ने अप्रैल में ही कह दिया था कि सरकार इस बार भी करीब 55 लाख टन गेहूं का आयात करेगी। इतने पहले ही सरकार की इस घोषणा से अंतरराष्ट्रीय बाजारों में गेहूं के दाम चढ़ने में मदद मिली।

 

   यह सच है कि इस बार पूरे विश्व में गेहूं की फसल अच्छी नहीं है। कनाडा, अमरीका और आस्ट्रेलिया में गेहूं की फसल खराब हुई है। लेकिन भारत के इतनी भारी मात्रा में आयात की घोषणा से दाम और चढे। अमरीका में शि‍कागो के सेंट्रल बोर्ड आफ ट्रेड में 31 जून को गेहूं के भाव जहां 5.97 डालर प्रति बुशेल थे वहीं भारत के गेहूं आयात की अटकलों के बीच 31 अगस्त को इसके भाव बढ़कर 8.05 डालर प्रति बुशेल हो गए।

 

    गौरतलब है कि सरकार ने अब तक लगभग 13 लाख टन गेहूं आयात का फैसला किया है जबकि इस बार निजी कंपनियों ने 850 रूपए क्‍विं‍टल के सरकारी भाव के मुकाबले 870 रूपए से 925 रूपए प्रति क्‍विं‍टल का दाम देकर करीब 11.10 लाख टन गेहूं की खरीद की है। मतलब साफ है कि अगर सरकार ने दाम अधिक दिये होते या निजी कंपनियों को किसानों से सीधी खरीद पर रोक लगी होती तो सरकार को गेहूं आयात की जरूरत हीं पड़ती।

 

   विश्लेषकों का कहना है कि सरकार ने अगर अंतरराष्ट्रीय टेंडर के बजाए घरेलू बाजार से गेहूं खरीदने का प्रयास करती तो देश में इस बार इतनी पैदावार हुई है कि उसे यहीं विदेशों से कहीं सस्ता गेहूं मिल जाता।

 

   इन दिनों स्थानीय थोक मंडियों में मिल क्वालिटी गेहूं के दाम 1000.1015 रूपए प्रति क्‍विं‍टल के बीच चल रहे हैं। कारोबारियों ने आशंका जतायी है कि सरकार के दोगुने दाम पर गेहूं आयात के इस फैसले से आगे आने वाले त्योहारी मौसम में गेहूं के दाम चढ सकते हैं।

 

   कारोबारियों का कहना है कि ऐसा लगता है कि सरकार मान चुकी है कि आगे आने वाले दिनों में गेहूं के भाव और चढ़ेगे। अगले दो महीनों में किसान अपना बचा हुआ स्टाक भी मिलों के पास ले आएंगे। ऐसे में वे आयतित कीमत के हिसाब से दाम चाहेंगे।

    विश्लेषकों का कहना है कि सरकार अगर गेहूं आयात से बचना चाहती है तो उसे किसानों के लिये गेहूं के समर्थन मूल्य में बढ़ोत्तरी के साथ ही सरकारी खरीद की पूरी व्यवस्था ही चुस्त दुरूस्त करनी होगी। इसके साथ भूमि का उपजाऊपन बनाए रखने के लिये आर्गनिक कृषि को बढ़ावा दिये जाने की जरूरत है। 

          मैं नहीं था लि‍खते समय कवि‍ और चि‍त्रकार गोबि‍न्‍द प्रसाद का दूसरा कवि‍ता संग्रह है जो हाल ही में ज्ञानपीठ प्रकाशन से छप कर आया है। गोबि‍न्‍द प्रसाद का पहला कवि‍ता संग्रह कोई ऐसा शब्‍द दो 1996 में वाणी प्रकाशन से छपा था। दूसरे संग्रह को सामने आने में 11 साल का वक्‍त लगा।

  

मैं नहीं था लि‍खते समय में गोबि‍न्‍द की पि‍छले 10 से 11 साल के वक्‍फे में लि‍खी कवि‍ताओं का संग्रह है। इन कवि‍ताओं में इतने लंबे समय के बीच कवि‍ की संवेदना में आए बदलाव का पता मि‍लता है।

   बकौल दि‍नेश कुमार शुक्‍ल गोबि‍न्‍द प्रसाद की कवि‍ताएं पाठक के पास वैसे ही सहज चली आती हैं जैसे ससुराल से लौटती बेटी नि‍स्‍संकोच मां की गोद में समा जाती है। सहजता इन कवि‍ताओं का स्‍व भाव है।

   गोबि‍न्‍द की कवि‍ताओं में उनके चि‍त्रकार व्‍यक्‍ति‍त्‍व को साफतौर पर महसूस कि‍या जा सकता है। अपने चि‍त्रों की तरह ही अपनी कवि‍ताओं में अक्‍सर मौन और अंतराल का सहारा लेते हैं। उनकी कवि‍ताएं वाचाल नहीं हैं। वे बहुत खामोशी से अपनी बात कह जाती है। पेश है मैं नहीं था लि‍खते समय की कुछ चुनी हुई कवि‍ताएं। 

मैं नहीं था लि‍खते समय

लि‍खते समय मैं नहीं था वह

जो कि‍ मैं था लि‍खने से पहले

मुझ में दीख पड़ी कवि‍ता

      लपट कोई नीली

      तुमने उसे रख दि‍या

      मांगे हुए उजाले के सामने

अनुभव जो झलकता था

मेरी पसलि‍यों के साज़ में

दबा, लेकि‍न आह में छलकता-सा

उसे रख दि‍या तुमने

खुले आसमान के बीचो-बीच

     शब्‍दों के बंजर इलाक़े में

और मैं अपना अनुभव छि‍नता हुआ

      देखता रहा चुपचाप

फि‍र तुमने

मुझसे वह लय भी छीन ली

मैं जि‍समें अहर्निश जागता था

वह लय भी

जि‍समें मेरे होने के राज

      धड़कते थे साज़ बन

तुमने उस अकेली और अनबोली

दर्द की लकीर को भी

रख दि‍या उठाकर

चैत की उदास हवा के सामने

जो मेरे सीने में कौंधती थी

बि‍जली की तरह

मर्म की आवाज बन

अब मेरे पास मेरा क्‍या है

था जो ठीकरा वह भी धुल गया

मि‍ट्टी और हवाओं में

लपट बनकर

आकाश की ऋचाओं में

अब मुझे मेरे अनदेखे में सुनो

अब मुझे मेरे अनकहे में देखो

मैं यहां हूं, यहां हूं मैं !

लखौरी ईंटो से झांकते

मेरे बचपन की धूप में

ढ़ह गए बुर्ज की

भुरभुराती लखौरी ईंटो से झांकते

मेरे दादा हैं

परझाइयों में ढ़ूढते

ऊंघते हुए बैठ

पि‍ता की शि‍कस्‍ता आवाज

तैर आती है मुझ तक

लौ के उदास सन्‍नाटे में

फ़क़ों से भरे दि‍न हैं

घर कुनबे के बुज़ुर्ग और सुबकते बच्‍चे

बहू-बेटि‍यां, मां और दादी की सूनी आंखों में

          लहकते हुए पुरखों के सपने हैं

तुम्‍हें कुछ पता है

ग़ुरबत में यह भी ग़रीबी से लड़ने की अदा है

समुद्र के सामने

मैं चुपचाप

खड़ा हूं समुद्र के सामने

    तुम्‍हारे ध्‍यान की धूप में

    खड़ा हूं मैं चुपचाप, अपने को अगोरता

    समुद्र के सामने; सुनता हुआ

    उठ रही

    लौटती लहरों की वेदना धवल

वि‍संगति‍ की धार पर

काट दि‍या पूरा जीवन

    एक तरफ़ मरू-एक तरफ़ जल

बि‍खरा हुआ पूरा

समेटा हुआ अधूरा

कैसे-कैसे दुख हैं

जो सुख की चादर लि‍पटे हैं

चाहता हूं मैं पूरे समुद्र को इस चादर में बांध लूं

समुद्र जो नि‍धि‍ वन है

समुद्र जो सौन्‍दर्य है का सार है

समुदं जो सर्जना की कोख है

समुद्र जो सर्जना के रक्‍त में डूबा रहता है उम्र भर

     चाहता हूं मैं

     पूरे समुद्र को इस चादर में बांध लूं   

  

महाराग

तुम्‍हारी काया:

       चांदनी

रात के दूसरे पहर में

उमड़ता हुआ समुद्र

कांच के नाज़ुक आबगीने से मानो

छलक रहा हो

      समय का महाराग

प्‍यास की तरह लि‍पटा हुआ हूं मैं

तुम्‍हारी काया के कांच से

      अग्‍नि‍रूपा

      सहस्ररूपा तुम

      भोर से पहले न जाने कि‍तनी बार

      भोर रचोगी

हर क्षण अब एक नए लोक में

      जन्‍मांतर हूं मैं….

  नयी बस्‍ति‍यों की तरफ

नए-नए दोस्‍त होंगे

नए संग-सहारे होंगे

जहां पहुंचूंगा मुरादों का सफ़र तय करके

कुछ फ़ि‍दा मुझ पर

तो कुछ लोग ख़फ़ा भी होंगे

मां की नीद में

बच्‍चों ने करवटें ली होंगी

तो कि‍सी ने सहसा गलि‍यारे में कि‍लक भरी होगी

सीढ़ि‍यों से ज़रा हटकर

कि‍सी कोने में आंख मलते हुए

ख़ुद को सहेजते

अंगीठी कि‍सी ने दहकायी

    उठ रहा होगा धुआं

कोई ऐसी भी होगी

जि‍सकी अलसायी आंखों में

    झांक रहा होगा कुआं

सुबह से पहले परि‍न्‍दे भी

अपनी उड़ान में गुम होंगे

अजनबि‍यों के बीच

    अपना-सा

    दि‍न जो बीत गया

खुली आंखों में सपना-सा…

यादों की कि‍ताब बन्‍द करता हूं

बहरहाल मैं भी            चलता हूं घर से

बाहर आने को भीतर से

रातों के ख़ाब झटककर

नयी चादर बुनने को, रंग नए भरने को

नयी बस्‍ति‍यों की तरफ़ चलता हूं

सूरज को भी नए तार सो बुनना होगा

धरती को भी राग नए सुनाने होंगे