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Archive for मई, 2007

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 उच्‍चतम न्‍यायालय ने गुरूवार को समाजसेवी वंदना शिवा की गेहूं के आयात के सरकार के फैसले पर आपत्तियों से संबधित याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि वह नीतिगत मामलों में हस्‍तक्षेप नहीं करना चाहती।  

वंदना शिवा ने एक बहुत ही सीधी सी बात पर आपत्ति की थी कि सरकार‍ लगभग 1680 रूपए प्रति क्विंटल के भाव से गेहूं का आयात क्‍यों करना चाहती है जबकि उसे देश में ही आयतित गेहूं की गुणवत्‍ता से कहीं बेहतर गेहूं महज 1000 रूपए प्रति क्विंटल के भाव से मिल सकता है।   

यह सवाल सिर्फ वंदना शिवा ही हर शख्‍स के मन में उठना चाहिये कि सरकार अपने किसानों को तो प्रति क्विंटल 750 रूपए समर्थन मूल्‍य एवं 100 रूपए बोनस मिलाकर 850 रूपए प्रति क्विंटल दे रही है जबकि विदेशों से वह लगभग दोगुनी कीमत पर आयात करने को उतारू है।  

 सरकार विदेशों से चाहे जितना महंगा गेहूं मंगाए लेकिन वह सब्सिडी देकर सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्‍यम से सस्‍ता गेहूं बेचती है। लेकिन वही सब्सिडी वह किसानों को क्‍यों नहीं देती। अगर सरकार समर्थन मूल्‍य 200 रूपए बढ़ा दे और आम आदमी को बेचते समय इतने ही रूपए की स‍ब्सिडी दे दे तो भी उसे गेहूं विदेशों से कहीं अधिक सस्‍ता पड़ेगा।  

   हालांकि ऐसा कुछ होने वाला नहीं है क्‍योंकि कृषि मंत्री शरद पवार ने कुछ दिनों पहले बड़ी बेशर्मी से बयान दिया था कि सरकार विदेशों से गेहूं आयात करेगी लेकिन किसानों के लिये तय न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य में बढ़ोत्‍तरी नहीं करेगी। 

ऐसा भी नहीं है कि देश में इस वर्ष गेहूं का उत्‍पादन कम हुआ हो जिसकी वजह से सरकार को गेहूं आयात करने की नौबत आन पड़ी हो। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार पिछले साल देश में 6.94 करोड़ टन गेहूं का उत्‍पादन हुआ था और इस वर्ष 7.37 करोड़ टन गेहूं की उपज होने की संभावना है।  

लाख कोशिशों के बाद भी सरकार इस बार गेहूं की सरकारी खरीद का लक्ष्‍य पूरा नहीं कर सकी। सरकार ने बफर स्‍टाक के लिये 1.5 करोड टन गेहूं की खरीद का लक्ष्‍य तय किया था लेकिन शुक्रवार तक 97 लाख टन गेहूं की ही खरीद हो सकी थी। इसका मतलब है कि इस बार भी सरकार ने करीब 50 लाख टन गेहूं आयात का मन बना लिया है। राज्‍य व्‍यापार निगम पहले ही 10 लाख टन गेहूं के आयात का टेंडर जारी कर चुका है।  

 पिछले साल भारत ने खासकर आस्‍ट्रे‍लिया से 55 लाख टन गेहूं का आयात किया था। भारत द्वारा आयात करने से अंतरराष्‍ट्रीय बाजार में गेहूं के दामों में काफी उछाल आ गया था।  इस उछाल की वजह से अफगानिस्‍तान, अल्‍जीरिया, ब्राजील, ईरान और ट्यूनीशिया जैसे गेहूं के पारंपरिक आयातक देशों की शामत आ गयी थी। इस साल भी भारत द्वारा गेहूं आयात करने की खबरों से अंतरराष्‍ट्रीय बाजार में गेहूं की कीमतों में उबाल आ गया है। 

  ऐसे में यह वाजिब सवाल उठता है कि सरकार गेहूं का आयात करने पर क्‍यों उतारू है। क्‍या राजनेताओं को विदेशी कंपनियों से मिलने वाली दलाली भी एक बड़ी वजह है। सरकार अगर चाह ले तो निजी कंपनियां उसका मुकाबला नहीं कर सकतीं। क्‍यों नहीं सरकार थोड़ा और समर्थन मूल्‍य बढ़ाकर निजी कंपनियों के मुकाबले किसानों से अधिक गेहूं खरीद लेती। 

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अमीर खुशरो

 अमीर खुशरो को हिंदवी का पहला शायर माना जाता है। वह बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। अफगानी पिता एवं भारतीय माता के पुत्र खुशरो एक सूफी कवि के रूप में जाने जाते हैं। भारतीय संगीत के विकास और खास कर भारत में सूफी संगीत के विकास में उनका महत्‍वपूर्ण योगदान रहा है। कहा जाता है कि तबले का अविष्‍कार उन्‍होंने ही किया था।

    सूफी संत निजामुद्दीन औलिया के शिष्‍य खुशरो को गंगा जमुनी तहजीब के एक बड़े प्रतीक के रूप में देखा जाता रहा है। 1253 में उत्‍तर प्रदेश के एटा जिले में जन्‍में खुशरो फारसी और हिंदी में समान रूप से दखल रखते थे। उनकी वे कविताएं तो लाजवाब हैं जिनमें उन्‍होंने एक छंद फारसी का रखा है तो दूसरा हिंदी का।

   उन्‍हें मुकरियों का उस्‍ताद कहा जाता था। उनकी मुकरियों में रोजमर्रा के जीवन की झलकियां मिलती हैं। उनमें हास परिहास है तो मीठी आलोचना भी मिलती है।

    खुशरो के बारे में एक किस्‍सा बड़ा मशहूर है कि एक बार वो एक कुएं पर पानी पीने गए। तो वहां पानी भर रहीं गाव वालियों ने कहा कि मिया खुशरो हम आपको पानी तभी पिलाएगी जब आप हमें खीर,चर्खा,कुत्‍ता और ढोल पर कविता सुनाएं। मिया खुशरो ने तत्‍काल यह मुकरी दे मारी।

खीर पकाया जतन से, चर्खा दिया चला

आया कुत्‍ता खा गया, तू बैठी ढोल बजा

    आज खुशरो अपने सूफी काव्‍य और लोकप्रिय मुकरियों की वजह से याद किए जाते हैं। लेकिन उनके व्‍यक्तित्‍व का एक पहलू यह भी है कि वह दरबारी कवि थे। बलबन के भतीजे मलिक छज्‍जू से लेकर वह अलाउद्दीन खिजली के दरबार में रहे। जहां उन्‍होंने दरबारी काव्‍य से लेकर अपने शरणदाताओं का इतिहास भी लिखा। बावजूद इसके खुशरो का वही काव्‍य अधिक महत्‍वपूर्ण है जो उन्‍होंने लोक के आलोक में लिखा। पेश है उनकी कुछ बेहद लोकप्रिय रचनाओं के कुछ अंश…….

 

 

ज़ेहाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल
दुराये नैना बनाये बतियाँ
कि ताब-ए-हिज्राँ न दारम ऐ जाँ
न लेहु काहे लगाये छतियाँ

चूँ शम्म-ए-सोज़ाँ, चूँ ज़र्रा हैराँ
हमेशा गिरियाँ, ब-इश्क़ आँ माह
न नींद नैना, न अंग चैना
न आप ही आवें, न भेजें पतियाँ

यकायक अज़ दिल ब-सद फ़रेबम
बवुर्द-ए-चशमश क़रार-ओ-तस्कीं
किसे पड़ी है जो जा सुनाये
प्यारे पी को हमारी बतियाँ

शबान-ए-हिज्राँ दराज़ चूँ ज़ुल्फ़
वरोज़-ए-वसलश चूँ उम्र कोताह
सखी पिया को जो मैं न देखूँ
तो कैसे काटूँ अँधेरी रतियाँ

……………….

ख़ुसरो दरिया प्रेम का, उलटी वा की धार,
जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार.
………..

सेज वो सूनी देख के रोवुँ मैं दिन रैन,
पिया पिया मैं करत हूँ पहरों, पल भर सुख ना चैन

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यारों चिट्ठाकारी की दुनिया में आने से खुद को रोक नहीं सका। सोचा मैं भी आज जाऊं। मेरे चिट्ठे पर दुनिया जहान की बाते होंगी। साहित्‍य एवं राजनीति की चर्चा भी होगी। अभी नया नया हूं। काफी कुछ सीख रहा हूं। थोड़े दिनों में यह चिट्ठा मुकम्‍मल आकार ले लेगा। लेकिन शुरूआत तो कर दी है। अपने चिट्ठे पर ज्‍यादा कुछ नहीं तो दूसरों के चिट्ठों पर कूदफांद ही सही पर अपन लिखेंगे जरूर।

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