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Archive for अक्टूबर, 2007

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वैश्‍ि‍वक शेयर बाजारों में भारी उथल पुथल को देखते हुए सोने जैसे अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित माने जाने वाले निवेश में निवेशकों का भरोसा एक बार फिर बढ़ा है।
   जहां एक ओर वैश्‍ि‍वक रूप से शेयर बाजारों की हालत पतली हुई है वहीं सोना नित नयी ऊंचाइयां छू रहा है। गत शुक्रवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने के भाव 770 डालर प्रति ट्राय औंस को छू गए जो जनवरी 1980 के बाद का सर्वोच्च स्तर है।
  दूसरी ओर तीन महीने पहले स्थानीय सर्राफा बाजार में सोना जहां आठ हजार रूपए प्रति 10 ग्राम हुआ करता था वहीं यह गत शुक्रवार को एक समय 10 हजार रूपए प्रति 10 ग्राम के स्तर को छू गया जो इस साल का सर्वोच्च स्तर है। इस प्रकार पिछले तीन महीने में सोने के दाम लगभग 25 प्रतिशत तक चढ़ गए हैं।
  वल्र्ड गोल्ड काउंसिल के उपनिदेशक केयुर शाह ने एक बातचीत में कहा कि सोने को पारंपरिक रूप से एक सुरक्षित निवेश माना जाता रहा है। खासकर संकट के दिनों में इसकी महत्ता बढ़ जाती है।
  श्री शाह का कहना है कि वैिश्वक शेयर बाजारों में भारी अनिश्‍ि‍चतता के बरक्स अन्य विदेशी मुद्राओं के मुकाबले डालर के लगातार गिरने तथा कच्चे तेल के दाम 90 डालर प्रति बैरल के पार चले जाने से सोने की कीमतों में पिछले कुछ महीनों से जिसे तरह से आग लगी है उससे निवेशकों का एक बार फिर से इसकी ओर आकर्षित होना लाजिमी है।
  डद्योग एवं वाणिज्य संगठनण्ऐसोचैम की हाल में जारी एक अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल में देश में सोने में निवेश पर रिटर्न यानी प्रतिफल करीब 34 फीसदी बढ़ा है। पिछले 30 दिनों में ही सोने में निवेश पर रिटर्न 14 प्रतिशत बढ़ा है।
   विश्लेषकों का कहना है कि वैश्‍ि‍वक रूप से वित्तीय बाजारों की हालत पतली होने के कारण निवेशक शेयर बाजारों से पैसा निकाल कर सोने में लगा रहे हैं। डालर के कमजोर होने से अन्य विदेशी मुद्राओं में सोने का निवेश सस्ता पड़ता है। यही कारण है कि सोने की लिवाली लगातार बढ रही है और इसके दाम आसमान छू रहे हैं।
   श्री शाह का कहना है कि सोने में आयी वैश्‍ि‍वक तेजी प्राकृतिक है क्योंकि इसकी मांग दिनों दिन बढ़ रही है जबकि आपूर्ति स्थिर है। विश्व में इस समय करीब 400 खानों से सोना निकाला जा रहा है। जहां इसकी  वैश्‍ि‍वक मांग करीब 5000 टन है वहीं पिछले पांच सालों से इसका उत्पादन औसतन 2550 टन के आसपास टिका है। सोने की मांग और आपूर्ति में इतने बड़े अंतराल से इसकी कीमतें आगे और ऊपर जाने की उम्मीद है।
  दूसरी ओर एसोचैम के आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2005..06 के दौरान भारत में सोने का उत्पादन जहां लगभग 3.53 टन था वहीं कारोबारी साल 2006.07 के दौरान यह घटकर 3.05 टन रह गया।
  यही कारण है कि भारत अपनी सोने संबंधी मांग को बड़े पैमाने पर आयात से पूरा करता है। वल्र्ड गोल्ड काउंसिल के आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2006.07 में जहां भारत ने करीब 750 टन सोने का आयात किया वहीं चालू वित्त वर्ष के दौरान यह बढ़कर 1000 टन हो जाने की उम्मीद है।
  धातु एवं जिंसों के वायदा कारोबार एक्सचेंजण्एनसीडीएक्स के क्षेत्रीय प्रमुख आर रघुनाथन का कहना है कि एक्सचेंजों के माध्यम से सोने चांदी का आनलाइन कारोबार शुरू हो जाने से निवशकों के लिये इसमें निवेश और अधिक सहज हो गया है।
   श्री रघुनाथन का कहना है कि डी मैट खाते से सोने चांदी का वायदा कारोबार शुरू होने से इसे भौतिक रूप से खरीद कर अपने पास रखने की जरूरत नहीं है। इससे जोखिम खत्म हो गया है।
   विदेशों में सोने में निवेश के लिये कई सालों के लिये अलग फंड बने हैं लेकिन भारत में यह प्रक्रिया अभी नयी नयी है। श्री रघुनाथन ने बताया कि पिछले दिनों यूटीआई ने सोने में निवेश के लिये एक फंड शुरू किया है। हालांकि यह बहुत सफल नहीं हो सका है क्योंकि निवेशकों में इसके प्रति अभी जागरूकता का अभाव है। उम्मीद है कि सोने में बढ़ते रिटर्न को देखते हुए आने वाले दिनों में कई अन्य कंपनियां सोने में निवेश के लिये कोष शुरू करेंगी। 
   सोने में निवेशकों की बढ़ती रूचि का एक कारण डालर के मुकाबले रूपए की मजबूती भी है। रूपए की मजबूती के कारण सोने का आयात सस्ता पड़ रहा है जिससे इसकी मांग बढ़ रही है। वैसे कारोबारियों का कहना है कि अगर रूपए के मुकाबले डालर अगर पिछले साल के स्तर पर रहता तो सर्राफा बाजार में सोने के दाम इस समय करीब 12000 रूपए प्रति 10 ग्राम होते।
  एसोचैम के आकलन के अनुसार भारत में आयात होने वाले सोने में से 70 फीसदी का इस्तेमाल आभूषणों और बाकी 30 प्रतिशत का प्रयोग निवेश के लिये बिस्कुटों और सिक्कों में होता है। सोने में निवेशकों की बढ़ती रूचि को ध्यान में रखते हुए इंडियन बैंक सहित कुछ बैंकों ने हालमार्क युक्त सोने के बिस्कुट और सिक्के बेचने शुरू कर दिये हैं।
   विश्लेषकों का कहना है कि निवेशकों के लिये आभूषणों के बजाए सोने के बिस्कुटों और सिक्कों में निवेश कहीं अधिक सहज होता है क्योंकि गहनों को दोबारा बेचने पर इसके दामों में 25 प्रतिशत तक की कटौती हो जाती है। वहीं बिस्कुटों और सिक्के लगभग बाजार भाव पर ही बिक जाते हैं।
   त्योहारी मौसम और शादी ब्याह का मौसम नजदीक आने के कारण देश में सोने की मांग प्राकृतिक रूप से बढ़ जाती है। ऐसे में सोने में निवेशकों की रूचि और बढने की उम्मीद है।

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स्‍टाक मार्केट में आज भारी अफरातफरी रही। एक मिनट के भीतर ही भारी गिरावट के कारण शेयर बाजारों में कारोबार को एक घंटे के लिये रोकना पड़ा।
   पार्टीसिपेटरी नोट.एन के जरिये विदेशी संस्थागत निवेशकों के शेयर बाजार में निवेश पर लगाम संबंधी भारतीय प्रतिभूति विनिमय बोर्डण्सेबी की कल की सिफारिश से बाजारों में इतनी दहशत रही कि सेंसक्स एक मिनट के भीतर ही 1507.71 अंक लुढ़कर 17544.90अंक रह गया। निफ़टी लगभग 10 फीसदी यानी 524.15 अंक गिरकर 5143.90 अंक रह गया।
  निचला सर्किट लगने के कारण बाजार में कारोबार को एक घंटे के लिये रोक दिया गया।

बाजारों की अफरातफरी के बीच वि‍त्‍त मंत्री को बयान देना पड़ा कि‍ सरकार का पीएन पर रोक लगाने का इरादा नहीं है। बस वह इसे  नि‍यंत्रि‍त करना चाहते है। यह आम नि‍वेशकों के हि‍त में है।

बाजार दोबारा खुलने के बाद कुछ सुधार की स्‍ि‍थति‍ में हैं। कई वि‍देशी संस्‍थागत नि‍वेशक गि‍रावट में खरीद कर रहे है। वि‍त्‍त मंत्री को उम्‍मीद है कि‍ शाम तक स्‍ि‍थति‍ काबू में आ जाएगी।

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  गेहूं.चावल सहित कई अन्य कृषि जिंसों के न्यूनतम समर्थन मूल्य.एमएसपी में बढ़ोत्तरी करके सरकार ने किसानों को तो राहत देने की तो कोशि‍श की है लेकिन इसके साथ ही आने वाले दिनों में रसोईं का बजट बेकाबू हो जाने का इंतजाम भी हो गया है।

    सरकार ने आगामी रबी मौसम के लिये गेहूं का समर्थन मूल्य 750 रूपए से 250 रूपए बढ़ाकर 1000 रूपए कर दिया है। पंजाब और हरियाणा जैसे प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों में 4.5 फीसदी मंडी कर. प्रतिशत आढ़तिया कर. फीसदी वैट. दो प्रतिशत ग्रामीण विकास कर निजी और सरकारी सभी कंपनियों को देना होता है। पंजाब में एक प्रतिशत बुनियादी ढांचा विकास कर भी देना होता है।

  इस प्रकार सरकार को ही अगले मौसम में गेहूं के लिये प्रति क्‍ि‍वंटल कम से कम 1100 रूपए चुकाने होंगे। कहा जा रहा है कि सरकार गेहूं की एमएसपी पर 50 रूपए का बोनस भी देगी। अगर ऐसा होता है तो परिवहन शुल्क मिलाकर सरकार को गेहूं की खरीद लागत 1200 रूपए से कम नहीं पड़ेगी। निजी कंपनियां तो सरकार से अधिक ही भाव देंगी।
  

ऐसे में थोक मंडियों में जो गेहूं इन दिनों 1050.1060 रूपए प्रति क्‍ि‍वंटल बिक रहा है वह अगले मौसम में 1300.1400 से कम नहीं मिलेगा। इसी अनुपात में आटे और मैदे की कीमतों में भी बढ़ोत्तरी होगी। ऐसे में महंगी रोटी खाने की आदत डाल लेने में ही भलाई है।

   सरकार ने धान के समर्थन मूल्य पर 50 रूपए का बोनस घोषित किया है। इसके साथ ही सरकार ने जौ का समर्थन मूल्य 85 रूपए, चना और मसूर का 155 रूपए, सरसो एवं सूर्यमुखी बीज के एमएसपी में में 85 रूपए की बढोत्तरी की है।

  एनसीडीएक्स इंस्टीट्यूट आफ कमोडिटी मार्केट्स एंड रिसर्च के निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी संजय कौल भी यह मानते हैं कि कृषि जिंसों का एमएसपी बढ़ाने से कीमतें तो बढ़नी ही हैं।

   थोक मंडियों के कई कारोबारियों का कहना है कि आमतौर पर सरकार पहले मार्च अप्रैल में गेहूं की खरीद शुरू होने से पहले एमएसपी का एलान करती थी। लेकिन इस बार काफी पहले ही एमएसपी की घोषणा से स्टाकिस्टों को सक्रिय होने का मौका मिल गया है।

   कारोबारियों का कहना है कि सरकार ने जिस दिन एमएसपी बढ़ाने की घोषणा की उसके ठीक दूसरे दिन थोक मंडियों में गेहूं.आटे और मैदे के भाव 50 से 60 रूपए प्रति क्‍ि‍वंटल ऊंचे हो गए।

     हालांकि श्री कौल सहित कई विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही एमएसपी बढ़ाने के कदम को चुनाव की आहट में उठाया गया कदम समझा जा रहा हो लेकिन बुवाई शुरू होने से पहले ही एमएसपी की घोषणा से किसान यह तय कर सकेगा कि उसे उसकी उपज की कम से कम कितनी कीमत मिलनी है।

  कृषि मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि सरकार ने बुवाई सत्र से पहले ही एमएसपी का एलान नीतिगत फैसले के तहत किया है। सरकार अब बुवाई से पहले ही एमएसपी की घोषणा कर दिया करेगी।

   इस मौसम में देश में पर्याप्त गेहूं नहीं मिलने पर विदेशों से दोगुने दाम पर गेहूं मंगाने के कारण चौतरफा आलोचना से सरकार इतना अधिक दबाव में आ गयी थी कि उसे एमएसपी बढ़ाने का कदम उठाना पड़ा।

  हालांकि कई विशेषज्ञों का मानना है कि केवल एमएसपी बढ़ाने से किसानों की समस्या का समाधान नहीं हो सकता। सरकार को पूरी गेहूं खरीद प्रक्रिया में ही सुधार करने की जरूरत है जिससे उसे पर्याप्त देश में ही पर्याप्त गेहूं और अन्य अनाज मिल सके।

   कमोडिटीज कंट्रोल डौट काम के प्रमुख कमल शर्मा का मानना है कि खेती किसानों के लिये लाभकारी हो इसके लिये जरूरी है कि किसानों को अपने उत्पादों को किसी भी बेचने की पूरी छूट होनी चाहिये। साथ उन्हें उनकी उपज का पूरा पैसा तत्काल मिलने की व्यवस्था की जानी चाहिये।

   श्री शर्मा का कहना है कि अगर गन्ना किसानों की बात की जाए तो गन्ना पेराई का नया सत्र शुरू हो गया है लेकिन उन्हें पिछले सीजन का ही पैसा नहीं मिल सका है। इसके साथ ही फसल बीमा योजना को सही तरीके से लागू करना चाहिये ताकि किसानों का जोखिम कुछ हद तक कम हो सके।

   दूसरी ओर श्री कौल का सुझाव है कि सरकार को पहले तो जितना गेहूं मिल सके खरीदना चाहिये। उसके बाद अगर गेहूं कम पड़ता है तो आयात करने के बजाए घरेलू बाजार में ही निविदा निकालनी चाहिये।

    सरकार के गेहूं और अन्य कृषि उत्पादों का एमएसपी बढ़ाने से यह तो तय हो गया है कि गरीबों की रोटी और महंगी ही होगी और इसमें कमी आने की फिलहाल तो कोई सूरत नजर नहीं आती। लेकिन सरकार को कृषि उत्पाद खरीद व्यवस्था को दुरूस्त करते हुए दूर दराज के इलाकों तक अपनी पहुंच बढ़ानी चाहिये ताकि गेहूं जैसे अनाजों के आयात की नौबत ना आए।

  

 

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भारतीय कंपनियों की विदेशों में अपना विस्तार करने की भूख लगातार बढ़ती ही जा रही है और एशि‍या तथा अमरीका के बाद अब यूरोप इनके निशाने पर है।

  भारतीय कंपनियों ने इस वर्ष जनवरी से अगस्त के बीच विदेशों में कंपनियां के अधिग्रहण एवं विलय के कुल 164 सौदे किये जिसके लिये उन्होंने लगभग 30.8 अरब डालर निवेश किया। इनमें से 16.3 अरब डालर निवेश से 55 सौदे केवल यूरोपीय कंपनियों से हुए।

   विश्व की अग्रणी लेखा एवं सलाहकार फर्म ग्रांट थोर्नटन द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक भारतीय कंपनियों ने इस साल लगभग 45 प्रतिशत निवेश केवल ब्रिटेन में किया। इसमें 6.7 अरब पौड़ में टाटा स्टील के अपने से कई गुना बड़ी एंग्लो डच कंपनी कोरस का अधिग्रहण भी शामिल है।

  भारतीय कंपनियों ने ब्रिटेन में 13.6 अरब डालर के निवेश से कुल 15 सौदे किये। यूरोप में भारतीय कंपनियों का दूसरा पसंदीदा देश जर्मनी रहा जहां इन्होंने दो अरब डालर खर्च करके पांच सौदे किये।

   विशेषज्ञों का मानना है कि यूरोपीय कंपनियों में भारतीय कंपनियों की बढ़ती रूचि का एक कारण यह है कि उन देशों की नीतियां इनके बेहद मुफीद पड़ती हैं। खासकर ब्रिटेन का प्रशासनिक एवं कानूनी ढांचा भारत जैसा ही है। दूसरे अंग्रेजी के कारण उन्हें भाषा संबंधी दिक्कतों का सामना भी नहीं करना पड़ता
   भारत.पाल और भूटान के लिये यूरोपीय आयोग के प्रतिनिधिमंडल के पूर्व प्रमुख फ्रांसिस्को द कामारा गोम्स ने भी पिछले दिनों अपना कार्यकाल खत्म होने के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में स्वीकार किया कि यूरोप में इस तरह का माहौल बनाया गया है कि भारतीय कंपनियां वहां सहज महसूस कर सकें।
  श्री गोम्स ने कहा कि टाटा कोरस और आर्सेलर मित्तल सौदे से यह बात साबित भी होती है। उनका मानना है कि भारत और यूरोप के बेहतर होते द्विपक्षीय आर्थिक संबंधों का ही नतीजा है कि दोनों एक दूसरे के यहां निवेश कर रहे हैं।
   यूरोप के बाद भारतीय कंपनियों ने लगभग 12 अरब डालर निवेश से 68 सौदे उत्तर अमरीका में किये। एशि‍याई देशों में इन कंपनियों ने लगभग 2.2 अरब डालर खर्च करके 31 सौदे किये। विश्व के अन्य हिस्सों में इस अवधि में 20 करोड़ डालर निवेश से 10 सौदे हुए।

   टाटा स्टील ने इस वर्ष अप्रैल में ब्राजील की सीएसएन को पछाड़कर लगभग 12.2 अरब डालर ब्रिटेन की कोरस का अधिग्रहण कर लिया। यह इस वर्ष किसी भारतीय कंपनी का सबसे बड़ा सौदा था। यह भारतीयों कंपनियों द्वारा इस वर्ष विदेश में अधिग्रहण में खर्च किये गए धन का करीब 40 फीसदी है।
   आदित्य बिरला समूह की एल्युमिनियम कंपनी हिंडाल्को का लगभग छह अरब डालर में इसी क्षेत्र की अमरीकी कंपनी नोवेलिस का अधिग्रहण दूसरा सबसे बड़ा सौदा रहा। ऊर्जा क्षेत्र की कंपनी सुजलान एनर्जी ने जर्मनी की आरई एनर्जी की 33.9 फीसदी हिस्सेदारी लेने में 1.7 अरब डालर निवेश किया जो भारतीय कंपनियों का तीसरा सबसे बड़ा सौदा रहा।
   विजय माल्या की यूबी समूह ने इसी साल ब्रिटेन के स्काच ब्रैंड वाइट एंड मैके का लगभग एक अरब डालर में अधिहग्रण किया जो यूरोप में किसी भारतीय कंपनी का तीसरा सबसे बड़ा सौदा है।

   पिछले साल भारतीय कंपनियों ने विदेशों में 8.6 अरब डालर के निवेश से अधिग्रहण एवं विलय के कुल 190 सौदे किये। इनमें से 3.6 अरब डालर के निवेश से 70 सौदे यूरोप में और 2.1 अरब डालर खर्च करके 71 सौदे उत्तर अमरीका में हुए।

   विशेषज्ञों का मानना है कि देश की अर्थव्यवस्था के बेहतरीन प्रदर्शन से भारतीय कंपनियों का न केवल आत्मविश्वास बढ़ा है बल्कि उनकी वित्तीय स्थिति भी मजबूत हुई है। प्रतिस्पर्धी ब्याज दरों पर भारतीय तथा अंतरराष्ट्रीय बैंकों एवं वित्तीय संस्थाओं से रिण की सहज उपलब्धता से भी इनका काम आसान हुआ।
   विदेशों में सौदों के लिये स्टैंडर्ड चाटर्ड. आईसीआईसीआई बैंक.भारतीय स्टेट बैंक. आरबीएस. एचबीओएस. सिटी ग्रुप. एलाइड आईरिश बैंक.एबीएन एमरो और बीएनपी पारीबा जैसे बैंकों ने भारतीय बैंको को वित्तीय सहायता मुहैया करायी।
   भारतीय कंपनियों में बैंको का विश्वास कितना बढ़ा है इसका अंदाजा भारतीय स्टेट बैंक के अध्यक्ष ओ.पी.भट्ट के हाल के इस खुलासे से लग सकता है कि उनके बैंक ने कोरस के अधिग्रहण के लिये टाटा को एक अरब डालर का रिण महज पांच मिनट में ही दे दिया था।
  यूरोप में भारतीय कंपनियों के अधिग्रहण और विलय का सिलसिला अभी थमने नहीं जा रहा है। टेटले चाय और कोरस के अधिग्रहण के बाद टाटा समूह की नजर ब्रिटेन के फोर्ड के मशहूर कार ब्रैंड लैंड रोवर और जगुआर के बड़े सौदे पर है। इसी तरह कई अन्य कंपनियां भी यूरोप में अधिग्रहण की कोिशश में हैं।

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