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Archive for नवम्बर, 2007

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 जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनावों में भाकपा माले के छात्र संगठन आइसा ने पहली बार चारों सीटों पर कब्‍जा जमाकर वामपंथ के कि‍ले को सुरक्षि‍त रखने में कामयाबी पायी है। दूसरी ओर माकपा एवं भाकपा के छात्र संगठन एसएफआई एआईएसएफ 1989 के बाद पहली बार सेंट्रल पैनल में कोई भी सीट जीत पाने में नाकामयाब रही।

आइसा के संदीप सिंह अध्यक्ष (1218), शेफ़ालिका शेखर उपाध्यक्ष (1077), पल्लवी डेका (1029) महासचिव और मोबिन आलम (933) संयुक्त सचिव के पद पर चुने गए हैं।

चारों पदों के लिए हुए चुनाव में आइसा उम्मीदवारों ने एसएफ़आई-एआईएसएफ़ और आरक्षण विरोधी संगठन यूथ फ़ॉर इक्वैलिटी के प्रत्याशियों को हराया।

आरक्षण विरोधी संगठन यूथ फॉर इक्वैलिटी अध्‍यक्ष एवं महासचि‍व पद पर दूसरे और उपाध्‍यक्ष एवं संयुक्‍त सचि‍व पद पर तीसरे स्‍थान पर रहा। लेकिन उसने भाजपा के अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) और कांग्रेस के छात्र संगठन (एनएसयूआई) के वोटों में ख़ासी सेंध लगाई।

अध्यक्ष पद के चुनाव में यूथ फ़ॉर इक्वैलिटी की बबिता शर्मा 924 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रहीं। इसी संगठन की स्वास्ति राव को 927 वोट मि‍ले और उन्‍हें महासचिव पद पर दूसरे स्थान से संतोष करना पड़ा।

एसएफ़आई और एआईएसएफ़ गठबंधन के रोशन किशोर और सेजुरी दासगुप्ता उपाध्यक्ष और संयुक्त सचिव पद के चुनाव में दूसरे पायदान पर रह गए।

 इस बार के चुनावों में अमरीका के साथ परमाणु क़रार, एसईज़ेड नीति ख़ासकर सिंगुर और नंदीग्राम के मामले और आरक्षण प्रमुखता से उठे। कैंपस में मज़दूरों के अधिकार को लेकर पिछले दिनों हुए आंदोलन और उसमें अलग-अलग छात्र संगठनों की भूमिका भी चुनावी मुद्दा रहा।

इस बार जेएनयू में प्रेसिडेंशि‍यल डि‍बेट के दौरान अखि‍ल भारतीय वि‍द्यार्थी परि‍षद.एबीवीपी और बहुजन समाज पार्टी के छात्र संगठन बीएसएफ के बीच झड़प भी हुई थी। दरअसल‍ एबीवीपी के अध्‍यक्ष पद के उम्‍मीदवार अमि‍त सिंह के राम पर पूछे गए एक सवाल पर बीएसएफ के रघुनाथ प्रसाद साकेत ने राम के चरि‍त्र पर कथि‍त आपत्‍ति‍जनक टि‍प्‍पणी कर दी जि‍स पर हंगामा खड़ा हो गया।

 अध्यक्ष पद पर जीते संदीप सिंह का कहना है, “ उनकी यह जीत भारत अमरीका परमाणु करार और वि‍शेष आर्थिक क्षेत्र.सेज के खि‍लाफ और सामाजि‍क न्‍याय के पक्ष में जेएनयू के छात्रों का जनादेश है। चारों पदों पर आइसा की जीत तमाम पार्टियों की जनविरोधी नीतियों के ख़िलाफ़ वोटिंग से संभव हुई है।

दूसरी ओर एसएफआई के दि‍ल्‍ली प्रदेश उपाध्‍यक्ष रोहि‍त का कहना है कि‍ उनका संगठन इस जनादेश को स्‍वीकार करता है। एसएफआई अपने भीतर झांक कर उन कारणों का पता लगाने की कोशि‍श करेगी जि‍नकी वजहों से उसे हार का मुंह देखना पड़ा।   

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