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 समाचार चैनल एनडीटीवी इंडि‍या ने आज से एक धारावाहि‍क शुरू कि‍या है, बांबे लायर्स। इस धारावाहि‍क का प्रोमो इस चैनल पर कई दि‍नों से चल रहा था। कि‍सी समाचार चैनल पर धारावाहि‍क की बात सुनकर अजीब तो लगा। लेकि‍न कार्यक्रम बहुत सार्थक लगा।

    आज जब समाचारों के नाम पर शुरू हुए चैनलों में समाचार के अलावा भूत प्रेत, सेक्‍स स्‍कैंडल, कि‍क्रेट, नाग नागि‍न, तंत्र मंत्र ही नजर आता है, वैसे समय में एनडीटीवी भीड़ से अलग नजर आता है। बांबे लायर्स एक अलहदा तरीके से यथास्‍थि‍ति‍वाद के खि‍लाफ हस्‍तक्षेप करता नजर आया।

  ‍बांबे लायर्स एक ऐसी कानूनी फर्म की कहानी है जो महि‍लाओं के खि‍लाफ होने वाले अत्‍याचारों के खि‍लाफ मजबूती से खड़ी नजर आती है। मुख्‍य वकील अपर्णा राय के रूप में मीता वशि‍ष्‍ठ का अभि‍नय लाजवाब रहा। वैसे भी मीता मेरी पसंदीदा अभि‍नेत्री रही हैं। एनएसडी दि‍ल्‍ली में उनके कई नाटक देखने का मौका मि‍ला है। वह लाजवाब अभि‍नेत्री हैं।

   बांर्ब लायर्स को देख कर अगर दूसरे चैनल भी कुछ सबक ले सकें तो अच्‍छा हो। लेकि‍न ऐसा होने की उम्‍मीद कम ही है। हां अगर इस कार्यक्रम का टीआरपी अच्‍छी मि‍ल गयी तो शायद वहां भी दि‍न बहुरें। चैनल का दावा है कि‍ यह धारावाहि‍क सच्‍ची घटनाओं पर आधारि‍त है। अगर वाकई ऐसा है तो यह खबरों को पेश करने का अलग अंदाज है जि‍सकी सराहना की जानी चाहि‍ये।  

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आज एक नए शब्‍द से परि‍चि‍त हुआ। वह शब्‍द है मौताणा। सुनने पर बड़ा अजीब लगा। मेरे एक वरि‍ष्‍ठ सहयोगी ने इस शब्‍द का मतलब समझाया।

दरअसल यह शब्‍द राजस्‍थान में उदयपुर के आसपास अधि‍क प्रचलि‍त है।    इस क्षेत्र में भील आदि‍ जनजाति‍यों में कि‍सी व्‍यक्‍ति‍ की मौत के पीछे अगर कि‍सी भी तरह कोई दूसरा व्‍यक्‍ति‍ अगर जि‍म्‍मेदार हो तो मृतक के रि‍श्‍तेदार उससे हर्जाना मांगते है जि‍से मौताणा कहते हैं।   

 मौताणा वसूलने के वे पुलि‍स या कचहरी का सहारा नहीं लेते। वे मृतक की लाश उसकी मौत के लि‍ये जि‍म्‍मेदार व्‍यक्‍ति‍ के घर के सामने रख देते हैं और उससे मौताणा मांगते हैं। वे यह भी कहते हैं कि‍ मौताणा दो वर्ना तुम्‍हारे घर में लाश का अंति‍म संस्‍कार करेंगे। और कि‍सी भी कीमत पर मौताणा वसूले बगैर लाश नहीं हटायी जाती। 

आज की खबर यह थी कि‍ एक भील व्‍यक्‍ति‍ एक सड़क पर टैक्‍टर से घायल हो गया और अस्‍पताल में उसकी मौत हो गयी। मृतक के रि‍श्‍तेदारों में टैक्‍टर मालि‍क के घर के सामने लाश रख दी और मौताणे की रकम 50000 रूपए वसूलने के बाद ही लाश हटायी गयी।   

मेरे सहयोगी बता रहे थे कि‍ एक बार कि‍सी भील को एक सांप ने काट लि‍या था। तो जि‍स व्‍यक्‍ति‍ के खेत से होकर वह सांप गया था मौताणे की रकम उससे वसूली गयी। एक बार तो हद ही हो गयी। एक व्‍यक्‍ति‍ की मौत हो गयी और कारण यह खोजा गया कि‍ बीस साल पहले फुटबाल खेलते हुए उस व्‍यक्‍ति‍ को चोट लग गयी था। माना गया कि‍ मौत उसी वजह से हुई होगी और लोग मौताणा वसूलने पहुच गए उस व्‍यक्‍ति‍ के घर।     

हि‍न्‍दी साहि‍त्‍य जगत वि‍मल कुमार को भारत भूषण सम्‍मान प्राप्‍त एक कवि‍ के रूप में ज्‍यादा जानता है। लेकि‍न पि‍छले दि‍नों वह एक नये रूप में नजर आए। दो कवि‍ता संग्रहों के बाद अपने उन्‍होंने गद्य लि‍खा है। वि‍मल की नयी कि‍ताब का नाम है चोर पुराण जि‍सका लोकार्पण पि‍छले दि‍नों हि‍न्‍दी के मशहूर आलोचक मैनेजर पांडे ने कि‍या।  

   चोर पुराण एक दि‍लचस्‍प कि‍ताब है। इसे कि‍सी एक श्रेणी में रख पाना कठि‍न है। इसमें लघुकथाएं हैं, व्‍यंग्‍य है और कवि‍ता भी। फि‍र भी इसे व्‍यंग्‍य संग्रह कह सकते हैं।

    यह कि‍ताब एक चोर के नजरि‍ये से अपने आस पास के समाज और वि‍डंबनाओं को परखने की कोशि‍श है।   वि‍मल कुमार का चोर आपको बुरा तो लग सकता है, लेकि‍न आप उससे नफरत नहीं कर सकते। यह चोर अलग अलग न‍जरि‍ये से दुनि‍यां को देखता है। इस क्रम में वह समाज की कई नंगी सचाइयों को उघेड़ देता है। 

     वि‍मल अपनी कि‍ताब में कई बार सीधे हमले में जुड़ जाते हैं। वह कई टुकड़ों में आज क राजनीति‍ज्ञों का नाम लेने लग जाते हैं। उस समय कई बार वो बड़ी वि‍वादस्‍पद और कहीं कहीं गैरजरूरी टि‍प्‍पि‍णि‍यां भी कर जाते हैं, जो नहीं की जाती तो कोई फर्क नहीं पड़ता। 

   पेश है पेंगुइन प्रकाशन से छपी वि‍मल की कि‍ताब चोर पुराण के कुछ दि‍लचस्‍प अंश। उम्‍मीद है आपको ये अंश पसंद आएगें। 

         मंगलाचरण

 चोर ने लि‍खी   एक   कहानी

इक कहानी में, सबकी  कहानी

सबकी कहानी, सबकी कहानी

चोर ने लि‍खी  एक   कहानी

झूठ  का  है  बस  बोलबाला

ताक़त का है सब खेल  सारा

पर सच की रहेगी हर पल नि‍शानी

चोर ने लि‍खी  एक   कहानी

इक कहानी में, सबकी  कहानी 

लाखों डकारे पर चोर न कहलाए

राजा का वो ही मन बहलाए

जो छल करे वो इनाम पाए

जो तारीफ करे वो सम्‍मान पाए

चोर ने लि‍खी  एक   कहानी

इक कहानी में, सबकी  कहानी

भांडा फूटे तो सब मि‍ल जावें

अपने का खूब नैति‍क कहलावें

कोई न देखे हमारी मजबूरी

हमने देखी सबकी कमजोरी

चोर ने लि‍खी  एक   कहानी

इक कहानी में, सबकी  कहानी  

जमा करें जो सोना चांदी

वो ही छीने हमारी आजादी

आएगी एक दि‍न इंकलाब की आंधी

बरसेगा तब खूब पानी 

चोर ने लि‍खी  एक   कहानी

इक कहानी में, सबकी  कहानी 

     चोर और चैनल

 चोर को महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हि‍न्‍दी वि‍श्‍ववि‍द्यालय की एक छात्रा से प्रेम हो गया। वह शादीशुदा थी। चोर भी शादीशुदा था। पता नहीं कैसे टीवी चैनलवालों को यह पता चला गया। वे भागे भागे आए। फि‍र उन्‍होंने ख़बर दी:एक शादीशुदा चोर ने एक शादीशुदा छात्रा से कि‍या प्रेम।   

   चोर ने चैनलवालों के एडि‍टरों को पत्र लि‍खकर गहरी आपत्‍ति‍ जतायी-        खबर में चोर शब्‍द का इस्‍तेमाल क्‍यों कि‍या गया ? क्‍या एक चोर एक मनुष्‍य की तरह प्रेम नहीं कर सकता ?क्‍या एक चोर के रूप में परि‍चय दि‍या जाना जरूरी ह ?यह मामला चोर और उस छात्रा तथा चोर की पत्‍नी और छात्रा के पति‍ के बीच का है। इसमें मीडि‍या कहां आ गया ?दरअसल प्रेम के माध्‍यम से दो स्‍त्रि‍यां मुक्‍त होना चाहती थीं।

पाद टि‍प्‍पणी: ख़बर का शीर्षक यह भी हो सकता था पर समाज में जब प्रेम का संकट गहरा है तो भाषा का भी संकट गहरा जाता है। 

     चोर और प्रधानमंत्री

चोर पहले अपने देश के प्रधानमंत्री को बहुत ईमानदार मानता था। वह सोचता था कि‍ वह भी चोरी का धंधा छोड़कर अपने प्रधानमंत्री की तरह ईमानदार बन जाएगा लेकि‍न उसके एक दोस्‍त ने कहा- ‘’तू ईमानदार नहीं बन सकता कभी भी, क्‍योंकि‍ तेरा वि‍श्‍व बैंक से कोई संबंध नहीं रहा है और तू जि‍न्‍दगी भर दि‍ल्‍ली में रहते हुए असम से राज्‍यसभा का सदस्‍य भी नहीं बन सकता।

 चोर और वामपंथी

चोर वामपंथि‍यों के पास गया। उसने पूछा, ‘’ आप सरकार को कब तक समर्थन देते रहेंगे। कभी न कभी उनका दामन छोड़ना पड़ेगा। आप लोग जन आंदोलन क्‍यों नहीं करते? सालोंसाल से जहां हैं, वहां से आगे नहीं बढ़ पाए?    वामपंथि‍यों का गुस्‍सा आया। उन्‍होंने कहा, ‘’ एक तो तू चार है। ऊपर से नसीहत देता है। चल फुट जा। सीधे झंडेवाला से आ रहा है क्‍या?

    चोर ने बुरा नहीं माना। वह जानता था वामपंथी हैं, आत्‍ममुग्‍ध होते हैं। पर हे प्रभु उन्‍हें माफ करना क्‍योंकि‍ उनकी नीयत खराब नहीं है। जि‍तनी बुद्धि‍ उनके पास है, वे उससे वर्षों से लड़ रहे हैं। 

     चोर और अमेरि‍का

कुछ चोर ऐसे भी थे। वे चोरी नहीं करते थे। वे सांप्रदायि‍कता के खि‍लाफ लड़ते हैं। वे सभी प्रेमचंद की परंपरा से अपने को जोड़ लेते हैं और आज अमरीका के खि‍लाफ लड़ते हैं, पर उनके बच्‍चे फ़रार्टदार अंग्रेजी बोलते हैं और अमरीका में ही पढ़ते हैं।   

    वे अपने बच्‍चों से मि‍लने तीन महीने अमरीका में ही रहते हैं। वहीं कि‍सी यूनि‍वर्सिटी में वि‍जि‍टि‍न्‍ग प्रोफसर भी हो जाते हैं। डॉलर कमाकर लाते हैं।

 वे अपने बच्‍चों की शादी फ़इव स्‍टार होटल में करते हैं, जहां सारे कॉमरेड जेएनयू में बि‍ताए गए दि‍नों की चर्चा करते हैं।

पाद टि‍प्‍पणी: क्‍या आप कभी ऐसे कि‍सी समाजवादी चोर के बेटे की शादी में गए हैं। मौका मि‍ले तो जरूर जाइये। आपको पता चल जाएगा कि‍ समाज में कि‍तने तरह के चोर होते हैं।

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 उच्‍चतम न्‍यायालय ने गुरूवार को समाजसेवी वंदना शिवा की गेहूं के आयात के सरकार के फैसले पर आपत्तियों से संबधित याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि वह नीतिगत मामलों में हस्‍तक्षेप नहीं करना चाहती।  

वंदना शिवा ने एक बहुत ही सीधी सी बात पर आपत्ति की थी कि सरकार‍ लगभग 1680 रूपए प्रति क्विंटल के भाव से गेहूं का आयात क्‍यों करना चाहती है जबकि उसे देश में ही आयतित गेहूं की गुणवत्‍ता से कहीं बेहतर गेहूं महज 1000 रूपए प्रति क्विंटल के भाव से मिल सकता है।   

यह सवाल सिर्फ वंदना शिवा ही हर शख्‍स के मन में उठना चाहिये कि सरकार अपने किसानों को तो प्रति क्विंटल 750 रूपए समर्थन मूल्‍य एवं 100 रूपए बोनस मिलाकर 850 रूपए प्रति क्विंटल दे रही है जबकि विदेशों से वह लगभग दोगुनी कीमत पर आयात करने को उतारू है।  

 सरकार विदेशों से चाहे जितना महंगा गेहूं मंगाए लेकिन वह सब्सिडी देकर सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्‍यम से सस्‍ता गेहूं बेचती है। लेकिन वही सब्सिडी वह किसानों को क्‍यों नहीं देती। अगर सरकार समर्थन मूल्‍य 200 रूपए बढ़ा दे और आम आदमी को बेचते समय इतने ही रूपए की स‍ब्सिडी दे दे तो भी उसे गेहूं विदेशों से कहीं अधिक सस्‍ता पड़ेगा।  

   हालांकि ऐसा कुछ होने वाला नहीं है क्‍योंकि कृषि मंत्री शरद पवार ने कुछ दिनों पहले बड़ी बेशर्मी से बयान दिया था कि सरकार विदेशों से गेहूं आयात करेगी लेकिन किसानों के लिये तय न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य में बढ़ोत्‍तरी नहीं करेगी। 

ऐसा भी नहीं है कि देश में इस वर्ष गेहूं का उत्‍पादन कम हुआ हो जिसकी वजह से सरकार को गेहूं आयात करने की नौबत आन पड़ी हो। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार पिछले साल देश में 6.94 करोड़ टन गेहूं का उत्‍पादन हुआ था और इस वर्ष 7.37 करोड़ टन गेहूं की उपज होने की संभावना है।  

लाख कोशिशों के बाद भी सरकार इस बार गेहूं की सरकारी खरीद का लक्ष्‍य पूरा नहीं कर सकी। सरकार ने बफर स्‍टाक के लिये 1.5 करोड टन गेहूं की खरीद का लक्ष्‍य तय किया था लेकिन शुक्रवार तक 97 लाख टन गेहूं की ही खरीद हो सकी थी। इसका मतलब है कि इस बार भी सरकार ने करीब 50 लाख टन गेहूं आयात का मन बना लिया है। राज्‍य व्‍यापार निगम पहले ही 10 लाख टन गेहूं के आयात का टेंडर जारी कर चुका है।  

 पिछले साल भारत ने खासकर आस्‍ट्रे‍लिया से 55 लाख टन गेहूं का आयात किया था। भारत द्वारा आयात करने से अंतरराष्‍ट्रीय बाजार में गेहूं के दामों में काफी उछाल आ गया था।  इस उछाल की वजह से अफगानिस्‍तान, अल्‍जीरिया, ब्राजील, ईरान और ट्यूनीशिया जैसे गेहूं के पारंपरिक आयातक देशों की शामत आ गयी थी। इस साल भी भारत द्वारा गेहूं आयात करने की खबरों से अंतरराष्‍ट्रीय बाजार में गेहूं की कीमतों में उबाल आ गया है। 

  ऐसे में यह वाजिब सवाल उठता है कि सरकार गेहूं का आयात करने पर क्‍यों उतारू है। क्‍या राजनेताओं को विदेशी कंपनियों से मिलने वाली दलाली भी एक बड़ी वजह है। सरकार अगर चाह ले तो निजी कंपनियां उसका मुकाबला नहीं कर सकतीं। क्‍यों नहीं सरकार थोड़ा और समर्थन मूल्‍य बढ़ाकर निजी कंपनियों के मुकाबले किसानों से अधिक गेहूं खरीद लेती। 

अमीर खुशरो

 अमीर खुशरो को हिंदवी का पहला शायर माना जाता है। वह बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। अफगानी पिता एवं भारतीय माता के पुत्र खुशरो एक सूफी कवि के रूप में जाने जाते हैं। भारतीय संगीत के विकास और खास कर भारत में सूफी संगीत के विकास में उनका महत्‍वपूर्ण योगदान रहा है। कहा जाता है कि तबले का अविष्‍कार उन्‍होंने ही किया था।

    सूफी संत निजामुद्दीन औलिया के शिष्‍य खुशरो को गंगा जमुनी तहजीब के एक बड़े प्रतीक के रूप में देखा जाता रहा है। 1253 में उत्‍तर प्रदेश के एटा जिले में जन्‍में खुशरो फारसी और हिंदी में समान रूप से दखल रखते थे। उनकी वे कविताएं तो लाजवाब हैं जिनमें उन्‍होंने एक छंद फारसी का रखा है तो दूसरा हिंदी का।

   उन्‍हें मुकरियों का उस्‍ताद कहा जाता था। उनकी मुकरियों में रोजमर्रा के जीवन की झलकियां मिलती हैं। उनमें हास परिहास है तो मीठी आलोचना भी मिलती है।

    खुशरो के बारे में एक किस्‍सा बड़ा मशहूर है कि एक बार वो एक कुएं पर पानी पीने गए। तो वहां पानी भर रहीं गाव वालियों ने कहा कि मिया खुशरो हम आपको पानी तभी पिलाएगी जब आप हमें खीर,चर्खा,कुत्‍ता और ढोल पर कविता सुनाएं। मिया खुशरो ने तत्‍काल यह मुकरी दे मारी।

खीर पकाया जतन से, चर्खा दिया चला

आया कुत्‍ता खा गया, तू बैठी ढोल बजा

    आज खुशरो अपने सूफी काव्‍य और लोकप्रिय मुकरियों की वजह से याद किए जाते हैं। लेकिन उनके व्‍यक्तित्‍व का एक पहलू यह भी है कि वह दरबारी कवि थे। बलबन के भतीजे मलिक छज्‍जू से लेकर वह अलाउद्दीन खिजली के दरबार में रहे। जहां उन्‍होंने दरबारी काव्‍य से लेकर अपने शरणदाताओं का इतिहास भी लिखा। बावजूद इसके खुशरो का वही काव्‍य अधिक महत्‍वपूर्ण है जो उन्‍होंने लोक के आलोक में लिखा। पेश है उनकी कुछ बेहद लोकप्रिय रचनाओं के कुछ अंश…….

 

 

ज़ेहाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल
दुराये नैना बनाये बतियाँ
कि ताब-ए-हिज्राँ न दारम ऐ जाँ
न लेहु काहे लगाये छतियाँ

चूँ शम्म-ए-सोज़ाँ, चूँ ज़र्रा हैराँ
हमेशा गिरियाँ, ब-इश्क़ आँ माह
न नींद नैना, न अंग चैना
न आप ही आवें, न भेजें पतियाँ

यकायक अज़ दिल ब-सद फ़रेबम
बवुर्द-ए-चशमश क़रार-ओ-तस्कीं
किसे पड़ी है जो जा सुनाये
प्यारे पी को हमारी बतियाँ

शबान-ए-हिज्राँ दराज़ चूँ ज़ुल्फ़
वरोज़-ए-वसलश चूँ उम्र कोताह
सखी पिया को जो मैं न देखूँ
तो कैसे काटूँ अँधेरी रतियाँ

……………….

ख़ुसरो दरिया प्रेम का, उलटी वा की धार,
जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार.
………..

सेज वो सूनी देख के रोवुँ मैं दिन रैन,
पिया पिया मैं करत हूँ पहरों, पल भर सुख ना चैन

पहली पाती

यारों चिट्ठाकारी की दुनिया में आने से खुद को रोक नहीं सका। सोचा मैं भी आज जाऊं। मेरे चिट्ठे पर दुनिया जहान की बाते होंगी। साहित्‍य एवं राजनीति की चर्चा भी होगी। अभी नया नया हूं। काफी कुछ सीख रहा हूं। थोड़े दिनों में यह चिट्ठा मुकम्‍मल आकार ले लेगा। लेकिन शुरूआत तो कर दी है। अपने चिट्ठे पर ज्‍यादा कुछ नहीं तो दूसरों के चिट्ठों पर कूदफांद ही सही पर अपन लिखेंगे जरूर।